अथर्ववेद मन्त्र १.२.३
शत्रुओं के बाणों से रक्षा की प्रार्थना अथर्ववेद १.२.३ का यह मन्त्र युद्ध और आत्मरक्षा की वैदिक भावना को व्यक्त करता है। मन्त्र में धनुष, प्रत्यञ्चा और तीक्ष्ण बाण का अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत करते हुए इन्द्र से प्रार्थना की गई है कि शत्रु की ओर से आने वाला प्रहार हमसे दूर हो जाए। इस […]
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