काण्ड 1

vedic mantra and healing waters

अथर्ववेद 1.3.5 मन्त्र: मूत्रमोचन, शर का प्रयोग और प्राचीन भारतीय चिकित्सा-दृष्टि

अथर्ववेद में मानव जीवन, स्वास्थ्य, रोग-निवारण और प्रकृति से संबंधित अनेक मन्त्र मिलते हैं। शौनक शाखा के अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त का पाँचवाँ मन्त्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें सूर्य का उल्लेख, शरीर के कल्याण की कामना और मूत्र के निर्बाध निष्कासन का वर्णन एक साथ मिलता है। इस सूक्त

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chatgpt image sep 28, 2026, 02 01 33 pm

अथर्ववेद १.३.४

🌙 चन्द्रमा, ओषधियाँ और मूत्र-प्रवाह का वैदिक मन्त्र अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त का चतुर्थ मन्त्र (१.३.४) शरीर में होने वाले निषेचन अर्थात् द्रव के बहिर्गमन और स्वास्थ्य की कामना से सम्बन्धित है। पिछले मन्त्र में वरुण का स्मरण किया गया था, जबकि इस मन्त्र में चन्द्रमा को शरस्य पितरम् अर्थात् ‘शर का

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🌿 अथर्ववेद १.३.३

मूत्र-प्रवाह एवं वरुण का वैदिक मन्त्र अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त का तृतीय मन्त्र जल, वरुण और शरीर से होने वाले निषेचन अर्थात् बहिर्गमन की वैदिक अवधारणा से सम्बन्धित है। अथर्ववेद के चिकित्सा-संबंधी मन्त्रों में शरीर के विभिन्न विकारों से मुक्ति तथा प्राकृतिक प्रक्रियाओं के सुचारु संचालन की कामना अनेक स्थानों पर दिखाई

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अथर्ववेद १.३.२

मूत्र-विनिरोध की वैदिक चिकित्सा, मन्त्रार्थ एवं सायणभाष्य का विश्लेषण अथर्ववेद १.३.२ का यह मन्त्र मूत्र-विसर्जन में उत्पन्न कठिनाई अथवा अवरोध के सन्दर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस मन्त्र में मित्र, शर, शरीर का कल्याण तथा निषेचन (स्राव/प्रवाह) जैसे पद आते हैं। कौशिकसूत्र में इस सूक्त के चिकित्सकीय प्रयोग का उल्लेख मिलने से यह

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अथर्ववेद १.३.१

मूत्र-विनिरोध की वैदिक चिकित्सा, मन्त्रार्थ एवं सायणभाष्य का विश्लेषण भूमिका अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त में ऐसे मन्त्र प्राप्त होते हैं जिनका सम्बन्ध शरीर में उत्पन्न मूत्र-विनिरोध तथा उससे सम्बद्ध रोगावस्था के निवारण से जोड़ा गया है। इस सूक्त का विशेष महत्त्व इसलिए है कि इसमें मन्त्रार्थ, सायणाचार्य की व्याख्या तथा कौशिकसूत्र में

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अथर्ववेद 1.2.4

रोग और आस्राव की निवृत्ति में मुञ्ज का वैदिक प्रयोग अथर्ववेद — प्रथम काण्ड, प्रथम अनुवाक, द्वितीय सूक्त, चतुर्थ मन्त्र अथर्ववेद में मानव-जीवन से जुड़े रोग, स्वास्थ्य, औषधि, शान्ति और रोग-निवारण के अनेक मन्त्र प्राप्त होते हैं। द्वितीय सूक्त का चतुर्थ मन्त्र भी इसी चिकित्सा-परम्परा से सम्बन्धित है। इस मन्त्र में रोग तथा आस्राव की

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अथर्ववेद मन्त्र १.२.३

शत्रुओं के बाणों से रक्षा की प्रार्थना अथर्ववेद १.२.३ का यह मन्त्र युद्ध और आत्मरक्षा की वैदिक भावना को व्यक्त करता है। मन्त्र में धनुष, प्रत्यञ्चा और तीक्ष्ण बाण का अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत करते हुए इन्द्र से प्रार्थना की गई है कि शत्रु की ओर से आने वाला प्रहार हमसे दूर हो जाए। इस

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अथर्ववेद (१.२.२)

शत्रुओं से रक्षा और शरीर को अभेद्य बनाने की प्रार्थना ऋग्वेद का यह मन्त्र युद्ध और आत्मरक्षा की भावना को व्यक्त करता है। इसमें साधक धनुष की प्रत्यञ्चा से अपने ऊपर प्रहार न करने की प्रार्थना करता है तथा इन्द्र से अपने शरीर को पत्थर के समान दृढ़ और शस्त्रों से अभेद्य बनाने की कामना

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अथर्ववेद १.२.१

वैदिक विज्ञान एवं जीवन-दर्शन: ‘विद्मा शरस्य’ अथर्ववेद काण्ड १, सूक्त २, मन्त्र १ अथर्ववेद का यह मन्त्र प्रकृति, ऊर्जा, पृथ्वी और मानव-निर्मित साधनों के पारस्परिक संबंध पर एक गहन दृष्टि प्रस्तुत करता है। मन्त्र में ‘शर’ के पिता के रूप में पर्जन्य और माता के रूप में पृथिवी का उल्लेख मिलता है। सायणभाष्य की दृष्टि

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अथर्ववेद १/१/४

श्रुत ज्ञान से कभी वियुक्त न हों 📜 अथर्ववेद दैनिक मन्त्र अथर्ववेद — काण्ड १, सूक्त १, मन्त्र ४ मूल मन्त्र उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम् ।सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि ॥४॥ सरल भावार्थ वाणी के स्वामी वाचस्पति हमारे समीप आवाहित हों और हमें अपने समीप बुलाएँ। हम प्राप्त किए हुए श्रुत ज्ञान के साथ

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