शत्रुओं के बाणों से रक्षा की प्रार्थना
अथर्ववेद १.२.३ का यह मन्त्र युद्ध और आत्मरक्षा की वैदिक भावना को व्यक्त करता है। मन्त्र में धनुष, प्रत्यञ्चा और तीक्ष्ण बाण का अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत करते हुए इन्द्र से प्रार्थना की गई है कि शत्रु की ओर से आने वाला प्रहार हमसे दूर हो जाए।
इस मन्त्र में वैदिक ऋषि ने युद्ध के बाहरी दृश्य के साथ-साथ सुरक्षा और विजय की आकांक्षा को भी अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। सायणाचार्य की व्याख्या तथा निरुक्त और पाणिनीय व्याकरण के आधार पर इसके शब्दों का अर्थ और भी स्पष्ट होता है।
१. मन्त्र एवं पदपाठ
मन्त्र
वृक्षं यद्गावः परिषस्वजाना अनुस्फुरं शरमर्चन्त्यृभुम् ।
शरुमस्मद्यावय दिद्युमिन्द्र ॥३॥
पदपाठ
वृक्षम् । यत् । गावः । परिऽसस्वजानाः । अनुऽस्फुरम् । शरम् । अर्चन्ति । ऋभुम् ।
शरुम् । अस्मत् । यवय । दिद्युम् । इन्द्र ॥३॥
२. सरल हिन्दी अर्थ
हे इन्द्र! धनुष के दण्ड से लिपटी हुई प्रत्यञ्चा जब खींचकर छोड़ी जाती है, तब वह जिस चमकते हुए, तीक्ष्ण और प्रहार करने वाले बाण को हमारी ओर गति देती है, उस भयंकर बाण को हमसे दूर कर दीजिए।
अर्थात् हे इन्द्र! शत्रु की ओर से आने वाले तीक्ष्ण अस्त्र और उसके प्रहार से हमारी रक्षा कीजिए तथा उस प्रहार को हमसे दूर कर दीजिए।
३. मन्त्र में धनुष और बाण का चित्रण
मन्त्र में प्रयुक्त वृक्षम्, गावः, परिषस्वजानाः, अनुस्फुरम्, शरुम् और दिद्युम् जैसे शब्द युद्ध के उपकरणों और उनकी गति का चित्र सामने रखते हैं।
यहाँ वृक्षम् का प्रयोग सामान्य वृक्ष के लिए न होकर उसके विकार अर्थात् लकड़ी से बने धनुष के दण्ड के लिए किया गया है।
इसी प्रकार गावः शब्द यहाँ सामान्यतः ‘गायें’ का अर्थ देने के बजाय धनुष की प्रत्यञ्चा के अर्थ में प्रयुक्त माना गया है।
इस प्रकार मन्त्र का आरम्भ ही धनुष की संरचना और उससे छोड़े जाने वाले बाण के दृश्य से होता है।
४. ‘वृक्षम्’ शब्द का व्याकरणिक विवेचन
वृक्षम् यहाँ धनुष के लकड़ी के दण्ड के अर्थ में प्रयुक्त है।
इस शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में उणादि परम्परा तथा पाणिनीय सूत्रों का उल्लेख किया जाता है। ‘ओव्रश्चू छेदने’ धातु से सम्बन्धित प्रक्रिया में उणादिसूत्र ‘स्नुव्रश्चिकृति…’ आदि के आधार पर इसकी व्युत्पत्ति समझाई जाती है।
इसके बाद सम्प्रसारण तथा वर्ण-परिवर्तनों की प्रक्रिया से ‘वृक्ष’ रूप सिद्ध किया जाता है।
इस मन्त्र में इसका विशेष अर्थ धनुष का काष्ठ-दण्ड है।
५. ‘गावः’ — प्रत्यञ्चा के लिए ‘गौ’ शब्द
मन्त्र में गावः शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है।
सामान्य संस्कृत में ‘गो’ का प्रमुख अर्थ गाय है, लेकिन वैदिक साहित्य में शब्दों के अर्थ प्रसंग के अनुसार विस्तृत होते हैं।
यास्काचार्य के निरुक्त में ‘गौ’ शब्द की विभिन्न व्युत्पत्तियों और अर्थों का विवेचन मिलता है। यहाँ ‘गौ’ को धनुष की प्रत्यञ्चा के अर्थ में ग्रहण किया गया है।
इसके पीछे दो अर्थ-संकेत माने जाते हैं—
- प्रत्यञ्चा किसी पशु के चमड़े अथवा स्नायु आदि से बनी हो सकती है।
- वह बाण को लक्ष्य तक गमन कराने वाली है।
इस प्रकार ‘गावः’ यहाँ धनुष की डोरी अथवा प्रत्यञ्चा का बोध कराता है।
६. ‘परिषस्वजानाः’ — धनुष से लिपटी हुई प्रत्यञ्चा
परिषस्वजानाः का अर्थ है—चारों ओर से लिपटी हुई, लगी हुई अथवा आलिंगन करती हुई।
यह शब्द ‘ष्वञ्ज परिष्वङ्गे’ धातु से सम्बन्धित माना जाता है।
वैदिक प्रयोग में छन्दसि लिट् तथा लिटः कानज्वा जैसे पाणिनीय सूत्रों के आधार पर इसके रूप की व्याख्या की जाती है।
अर्थ की दृष्टि से यह शब्द धनुष और प्रत्यञ्चा के परस्पर जुड़े होने का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है।
७. ‘अनुस्फुरम्’ — प्रत्यञ्चा की गति
अनुस्फुरम् का सम्बन्ध ‘स्फुर्’ धातु से है, जिसका अर्थ है—कम्पित होना, गति करना अथवा स्पन्दित होना।
धनुष की प्रत्यञ्चा को पीछे खींचने और छोड़ने पर उसमें जो तीव्र गति उत्पन्न होती है, उसी का संकेत इस शब्द में मिलता है।
अर्थात् मन्त्र में केवल धनुष और बाण का उल्लेख नहीं है, बल्कि बाण छोड़े जाने की गतिशील प्रक्रिया भी चित्रित हुई है।
८. ‘शरुम्’ — प्रहार करने वाला बाण
शरुम् का अर्थ है—हिंसक अथवा प्रहार करने वाला बाण।
इसकी व्युत्पत्ति ‘शॄ हिंसायाम्’ धातु से सम्बन्धित मानी गई है।
बाण का उद्देश्य ही लक्ष्य को भेदना और प्रहार करना है। इसलिए यहाँ ‘शरु’ शब्द में केवल अस्त्र का नाम ही नहीं, बल्कि उसके घातक और हिंसक प्रभाव का भी संकेत है।
९. ‘ऋभुम्’ — तीक्ष्ण और चमकता हुआ
ऋभुम् का अर्थ इस प्रसंग में ऐसे बाण से लिया गया है जो तीक्ष्ण और प्रभावशाली है।
सायणाचार्य की व्याख्या में बाण को शाण आदि पर घिसकर तीक्ष्ण किए जाने की कल्पना आती है। इससे मन्त्र में युद्ध के अस्त्र की तैयारी और उसकी मारक क्षमता का बोध होता है।
१०. ‘दिद्युम्’ — चमकता हुआ अस्त्र
दिद्युम् का सम्बन्ध ‘द्युत् दीप्तौ’ धातु से माना जाता है।
इसमें चमकने, प्रकाशित होने अथवा दीप्त होने का भाव है।
युद्ध में तीव्र गति से आने वाला चमकता हुआ अस्त्र या बाण यहाँ भय और प्रहार की तीव्रता का प्रतीक बन जाता है।
११. ‘यावय’ — हमसे दूर कर दो
यावय का अर्थ है—
“दूर करो”, “अलग कर दो”, “हमसे पृथक् कर दो।”
मन्त्र में इसका प्रयोग इन्द्र से प्रार्थना के रूप में हुआ है।
अस्मत् यावय — अर्थात् “हमसे दूर कर दो।”
यह पूरे मन्त्र का मुख्य प्रार्थना-भाव है। साधक स्वयं शत्रु के अस्त्र का सामना करने के बजाय इन्द्र से उस प्रहार को अपने से दूर करने की प्रार्थना करता है।
१२. सायण भाष्य के अनुसार मन्त्र का अर्थ
सायणाचार्य के अनुसार इस मन्त्र में धनुष और उसकी प्रत्यञ्चा के माध्यम से युद्ध का दृश्य प्रस्तुत किया गया है।
लकड़ी के धनुष-दण्ड से प्रत्यञ्चा जुड़ी हुई है। जब उसे पीछे खींचा जाता है और फिर छोड़ा जाता है, तो उसकी गति से तीक्ष्ण बाण लक्ष्य की ओर जाता है।
साधक इन्द्र से प्रार्थना करता है कि—
शत्रु की ओर से छोड़ा गया वह तीक्ष्ण और प्रहारकारी अस्त्र हम तक न पहुँचे।
इन्द्र उस अस्त्र को हमसे दूर कर दें और हमारी रक्षा करें।
१३. सायण की वैकल्पिक व्याख्या और श्लेष
सायणाचार्य की व्याख्या में इस मन्त्र के शब्दों से एक अन्य अर्थ-संकेत भी ग्रहण किया जाता है।
वृक्षम् और गावः को यदि क्रमशः वृक्ष और गाय के अर्थ में लिया जाए, तो एक सुन्दर दृश्य बनता है—
गर्मी से पीड़ित गायें घने वृक्ष की छाया का आश्रय लेती हैं और उससे मानो आलिंगन करती हैं।
इसी प्रकार सैनिक अथवा आश्रित लोग अपने स्वामी या आश्रयदाता की ओर संकेत और आदेश का अनुसरण करते हुए शत्रु पर बाण चलाते हैं।
इस प्रकार मन्त्र में शब्दों की बहुअर्थता के माध्यम से धनुष-बाण के युद्ध-दृश्य और वृक्ष के नीचे आश्रय लेती गायों—दोनों प्रकार के चित्र की सम्भावना दिखाई देती है।
१४. निरुक्त की दृष्टि
वैदिक मन्त्रों को समझने में यास्काचार्य का निरुक्त अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
इस मन्त्र में विशेष रूप से ‘गौ’ शब्द का धनुष की प्रत्यञ्चा के अर्थ में प्रयोग वैदिक शब्दों की बहुविध अर्थ-क्षमता को दिखाता है।
निरुक्त की पद्धति हमें यह समझने में सहायता करती है कि वैदिक मन्त्रों में शब्दों का अर्थ केवल लौकिक संस्कृत के सामान्य अर्थ से निर्धारित नहीं किया जा सकता। धातु, व्युत्पत्ति, प्रसंग और वैदिक प्रयोग—इन सभी को ध्यान में रखना आवश्यक है।
१५. पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि
इस मन्त्र के कई शब्द वैदिक संस्कृत की विशिष्ट संरचना और प्रयोग को प्रदर्शित करते हैं।
विशेष रूप से—
- परिषस्वजानाः — वैदिक लिट्-प्रयोग
- अनुस्फुरम् — स्फुर् धातु से सम्बन्धित व्युत्पत्ति
- शरुम् — हिंसा के अर्थ वाली धातु से सम्बन्ध
- दिद्युम् — द्युति/दीप्ति के अर्थ से सम्बन्धित रूप
- यावय — णिच् के माध्यम से ‘दूर करना’ का भाव
इससे स्पष्ट होता है कि वैदिक मन्त्रों की व्याख्या करते समय केवल अनुवाद पर्याप्त नहीं है; पद की व्युत्पत्ति और पाणिनीय प्रक्रिया को समझना भी आवश्यक है।
१६. मन्त्र का विनियोग
यह मन्त्र संग्राम में आत्मरक्षा तथा शत्रु के अस्त्रों से सुरक्षा की भावना से सम्बन्धित माना जाता है।
इसका विनियोग शत्रु के तीक्ष्ण बाणों और अस्त्रों से रक्षा तथा युद्ध में विजय की कामना के लिए इन्द्र की प्रार्थना में किया जाता है।
१७. आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक भाव
यद्यपि मन्त्र का प्रत्यक्ष प्रसंग युद्ध और अस्त्रों से सम्बन्धित है, इसका व्यापक भाव जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों पर भी लागू किया जा सकता है।
धनुष से निकलता हुआ बाण उन आकस्मिक संकटों, विरोध और बाधाओं का प्रतीक माना जा सकता है जो मनुष्य की ओर आते हैं।
इन्द्र यहाँ शक्ति, संरक्षण और विजय के दैवी भाव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इस दृष्टि से मन्त्र की प्रार्थना है—
“जो भी अनिष्टकारी शक्ति हमारी ओर प्रहार करने के लिए आती है, वह हमसे दूर हो और हमें संकटों से रक्षा प्राप्त हो।”
निष्कर्ष
अथर्ववेद १.२.३ का यह मन्त्र वैदिक ऋषि की युद्ध-संबंधी चेतना, अस्त्र-शस्त्र के सूक्ष्म निरीक्षण और दैवी संरक्षण की भावना को एक साथ प्रस्तुत करता है।
धनुष का दण्ड, प्रत्यञ्चा का खिंचना, बाण की तीव्र गति और उसके प्रहार से रक्षा की प्रार्थना—इन सबके माध्यम से मन्त्र अत्यन्त जीवंत युद्ध-दृश्य प्रस्तुत करता है।
सायणाचार्य की व्याख्या, यास्क के निरुक्त और पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन से यह मन्त्र केवल एक प्रार्थना न रहकर वैदिक भाषा, व्याकरण, निरुक्त और दर्शन के समन्वित अध्ययन का विषय बन जाता है।
मुख्य भाव:
“हे इन्द्र! शत्रुओं की ओर से आने वाले तीक्ष्ण अस्त्रों को हमसे दूर कर दीजिए और हमें सुरक्षित रखिए।”
संदर्भ
- अथर्ववेद, काण्ड १, सूक्त २, मन्त्र ३
- सायणाचार्य भाष्य
- यास्काचार्य — निरुक्त
- महर्षि पाणिनि — अष्टाध्यायी
- उणादिसूत्र परम्परा
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

