वैदिक विज्ञान एवं जीवन-दर्शन: ‘विद्मा शरस्य’
अथर्ववेद काण्ड १, सूक्त २, मन्त्र १
अथर्ववेद का यह मन्त्र प्रकृति, ऊर्जा, पृथ्वी और मानव-निर्मित साधनों के पारस्परिक संबंध पर एक गहन दृष्टि प्रस्तुत करता है। मन्त्र में ‘शर’ के पिता के रूप में पर्जन्य और माता के रूप में पृथिवी का उल्लेख मिलता है। सायणभाष्य की दृष्टि से इसका संबंध संग्राम में प्रयुक्त शर अर्थात् बाण से है, जबकि व्यापक दार्शनिक दृष्टि से यह प्रकृति को मानव-तकनीकी सामर्थ्य का मूल आधार मानने की प्रेरणा देता है।
१. मूल मन्त्र एवं पदपाठ
मन्त्र
विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं भूरिधायसम् ।
विद्मो ष्वस्य मातरं पृथिवीं भूरिवर्पसम् ॥ १ ॥
पदपाठ
विद्मा । शरस्य । पितरम् । पर्जन्यम् । भूरिऽधायसम् ।
विद्मो इति । सु । अस्य । मातरम् । पृथिवीम् । भूरिऽवर्पसम् ॥ १ ॥
२. शब्दार्थ
- विद्मा — हम जानते हैं।
- शरस्य — शर अर्थात् बाण/प्रक्षेप्य के।
- पितरम् — पिता, जनक अथवा उत्पादक स्रोत को।
- पर्जन्यम् — पर्जन्य; मेघ, वर्षा तथा प्रकृति की पोषणकारी शक्ति।
- भूरिधायसम् — बहुत अधिक धारण एवं पोषण करने वाला।
- विद्मो इति — हम भली-भाँति जानते हैं।
- सु — अच्छी प्रकार से।
- अस्य — इसके।
- मातरम् — माता अथवा जननी को।
- पृथिवीम् — पृथ्वी, विस्तृत आधार-तत्त्व को।
- भूरिवर्पसम् — अनेक रूपों को धारण करने वाली।
३. सायणभाष्य एवं अर्थ
सायणाचार्य की व्याख्या में मन्त्र का मुख्य संदर्भ संग्राम में प्रयुक्त होने वाले शर अर्थात् बाण से जुड़ा हुआ है। मन्त्र उसके मूल कारणों और उपादानों की ओर संकेत करता है।
भावार्थ:
हम उस शर के पिता रूप पर्जन्य को जानते हैं, जो प्रचुर मात्रा में पोषण करने वाला है। इसी प्रकार हम इस शर की माता रूप पृथिवी को भी भली-भाँति जानते हैं, जो विविध रूपों को धारण करने वाली है।
इस प्रकार मन्त्र प्रकृति के उन मूल कारणों की ओर संकेत करता है जिनसे मनुष्य के उपयोग में आने वाले भौतिक साधन और उनकी शक्ति संभव होती है।
यहाँ पर्जन्य और पृथिवी को पिता-माता के रूप में देखना प्रकृति और मानव-निर्मित साधनों के बीच कारण-कार्य संबंध को समझने का एक वैदिक ढाँचा प्रस्तुत करता है।
४. वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से मन्त्र की व्याख्या करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वैदिक मन्त्रों को आधुनिक वैज्ञानिक समीकरणों का प्रत्यक्ष विवरण मानना उचित नहीं है। फिर भी इसमें व्यक्त प्रकृति-आधारित कारण-कार्य संबंध को आधुनिक विज्ञान के कुछ सिद्धान्तों से दार्शनिक रूप से जोड़ा जा सकता है।
ऊर्जा और संवेग
आधुनिक बैलिस्टिक्स में किसी प्रक्षेप्य की गति और प्रभाव उसकी द्रव्यमान, वेग, गतिज ऊर्जा और संवेग जैसे भौतिक गुणों से संबंधित होते हैं।
उदाहरण के लिए—
गतिज ऊर्जा = ½ mv²
और
संवेग = mv
अर्थात् किसी भी गतिशील प्रक्षेप्य की शक्ति उसके भौतिक द्रव्यमान और उसे प्रदान की गई ऊर्जा से जुड़ी होती है।
मन्त्र में पृथिवी को माता और पर्जन्य को पिता के रूप में देखने से एक व्यापक प्राकृतिक दृष्टिकोण सामने आता है—मानव द्वारा निर्मित साधन अंततः पृथ्वी से प्राप्त पदार्थों और प्रकृति से उपलब्ध ऊर्जा पर निर्भर हैं।
पृथ्वी: पदार्थ का स्रोत
धातुएँ, खनिज, लकड़ी तथा अन्य निर्माण-सामग्री पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होती हैं। किसी भी पारंपरिक बाण या आधुनिक प्रक्षेप्य के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थ किसी न किसी प्राकृतिक स्रोत से आता है।
इस अर्थ में पृथिवी को ‘माता’ कहना एक गहन प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
पर्जन्य: जल और ऊर्जा-चक्र
पर्जन्य वैदिक साहित्य में वर्षा और मेघ से संबद्ध है। व्यापक प्राकृतिक संदर्भ में वर्षा जल-चक्र, कृषि, वनस्पति और पारिस्थितिक पोषण से जुड़ी है।
आधुनिक विज्ञान में जल-चक्र और सौर ऊर्जा पृथ्वी की अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए ‘भूरिधायसम्’ को प्रकृति की पोषणकारी क्षमता के संदर्भ में समझना उपयोगी हो सकता है।
पारिस्थितिकीय संतुलन
मन्त्र का एक महत्वपूर्ण जीवन-दर्शन यह है कि मनुष्य की सामर्थ्य प्रकृति से स्वतंत्र नहीं है।
हमारे उपकरण, भवन, वाहन, कृषि-व्यवस्था और तकनीकी साधन—सभी किसी न किसी रूप में—
पृथ्वी → प्राकृतिक संसाधन → मानव निर्माण → उपयोग
की प्रक्रिया पर निर्भर हैं।
इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की दीर्घकालीन सुरक्षा का विषय भी है।
५. व्याकरण एवं व्युत्पत्ति
पर्जन्यम्
‘पर्जन्य’ शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में वैदिक एवं व्याकरणिक परम्परा में विभिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं। यहाँ इसका मुख्य अर्थ वर्षा कराने वाली अथवा पोषण करने वाली प्राकृतिक शक्ति के रूप में ग्रहण किया गया है।
भूरिधायसम्
‘भूरि’ अर्थात् बहुत अधिक तथा ‘धा’ धारण/पोषण के अर्थ से संबंधित है। अतः भूरिधायस् का भाव बहुत अधिक धारण या पोषण करने वाले से जोड़ा जा सकता है।
पृथिवी
‘पृथु’ अर्थात् विस्तृत/विस्तीर्ण अर्थ से संबंधित व्युत्पत्ति-परम्परा में पृथिवी को वह माना जाता है जो व्यापक रूप से विस्तृत है।
इस प्रकार पृथिवी केवल मिट्टी या भूमि का नाम नहीं, बल्कि वैदिक चिन्तन में विस्तृत भौतिक आधार का भी बोध कराती है।
भूरिवर्पसम्
‘भूरि’ और ‘वर्पस्’ के आधार पर इसका अर्थ अनेक रूपों अथवा विविध आकृतियों को धारण करने वाली के रूप में समझा जाता है। पृथ्वी वास्तव में असंख्य जीव-जगत, वनस्पति, पर्वत, नदियों और भौतिक संरचनाओं को धारण करती है।
६. दैनिक जीवन में उपयोग
१. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएँ कहीं न कहीं प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं।
भोजन, वस्त्र, भवन, वाहन, मोबाइल फोन और अन्य तकनीकी साधन—सभी के पीछे पृथ्वी से प्राप्त पदार्थ और ऊर्जा का योगदान है।
इस मन्त्र का अध्ययन हमें उपभोग के साथ कृतज्ञता और उत्तरदायित्व का भाव विकसित करने की प्रेरणा देता है।
२. समस्याओं की जड़ को समझना
मन्त्र में किसी कार्य के मूल कारण को जानने पर बल दिखाई देता है।
जीवन में भी किसी समस्या का केवल बाहरी परिणाम देखने के बजाय उसके मूल कारण (Root Cause) को समझना अधिक उपयोगी होता है।
समस्या → कारण → मूल स्रोत → समाधान
यह दृष्टिकोण शिक्षा, व्यवसाय, परिवार और व्यक्तिगत निर्णयों में उपयोगी हो सकता है।
३. एकाग्रता और लक्ष्य-संधान
‘शर’ लक्ष्य की ओर जाने वाले साधन का प्रतीक भी माना जा सकता है।
जीवन में भी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं—
स्पष्ट लक्ष्य + उचित साधन + नियंत्रित ऊर्जा
यदि लक्ष्य स्पष्ट है लेकिन ऊर्जा और साधन व्यवस्थित नहीं हैं, तो सफलता कठिन हो सकती है।
इस दृष्टि से मन्त्र का अध्ययन आत्म-अनुशासन और लक्ष्य-संधान की प्रेरणा दे सकता है।
४. संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
पृथ्वी को माता मानने का व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि प्राकृतिक संसाधनों का अनावश्यक दोहन न किया जाए।
जल की बचत, वृक्षारोपण, मिट्टी का संरक्षण, ऊर्जा की बचत और वस्तुओं का जिम्मेदारी से उपयोग—ये सभी इस व्यापक वैदिक दृष्टिकोण से जुड़े व्यवहार हैं।
७. मन्त्र से मिलने वाला जीवन-सन्देश
इस मन्त्र का केंद्रीय संदेश इस प्रकार समझा जा सकता है—
मनुष्य की शक्ति प्रकृति से अलग नहीं है; उसके साधन, संसाधन और ऊर्जा अंततः प्रकृति के ही विभिन्न रूपों पर आधारित हैं।
पर्जन्य को पिता और पृथिवी को माता के रूप में देखने से मनुष्य और प्रकृति के बीच एक गहरा संबंध स्थापित होता है।
इसलिए वैदिक दृष्टि केवल संसाधनों के उपयोग की नहीं, बल्कि स्रोत को पहचानने, उसके प्रति कृतज्ञ होने और उसका संरक्षण करने की भी प्रेरणा देती है।
८. आज के जीवन में मन्त्र का अभ्यास
प्रातःकाल इस मन्त्र का शुद्ध उच्चारण करते हुए व्यक्ति कुछ क्षण प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव रख सकता है।
इसके साथ यह संकल्प लिया जा सकता है—
“मैं पृथ्वी के संसाधनों का विवेकपूर्वक उपयोग करूँगा, जल और ऊर्जा की रक्षा करूँगा तथा अपने जीवन की समस्याओं के मूल कारण को समझकर समाधान खोजूँगा।”
इस प्रकार मन्त्र का अध्ययन केवल वैदिक ज्ञान तक सीमित न रहकर दैनिक जीवन-दर्शन का हिस्सा बन सकता है।
निष्कर्ष
अथर्ववेद १.२.१ का यह मन्त्र ‘शर’ के संदर्भ से प्रारम्भ होकर पर्जन्य और पृथिवी के माध्यम से प्रकृति के मूल आधारों की ओर हमारा ध्यान ले जाता है।
सायणभाष्य इसे शर के कारण और उपादान से जोड़ता है, जबकि व्यापक दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र हमें याद दिलाता है कि मानव की तकनीकी और भौतिक शक्ति भी प्रकृति पर ही आधारित है।
पर्जन्य — पोषण और प्राकृतिक चक्र का प्रतीक।
पृथिवी — पदार्थ और भौतिक आधार का प्रतीक।
शर — मानव द्वारा निर्मित एवं प्रयुक्त साधन का प्रतीक।
अतः मन्त्र का एक महत्वपूर्ण आधुनिक संदेश है—
प्रकृति को समझो, उसके स्रोतों को पहचानो, उनका विवेकपूर्ण उपयोग करो और अपने जीवन की शक्ति को सही लक्ष्य की ओर निर्देशित करो।

