शत्रुओं से रक्षा और शरीर को अभेद्य बनाने की प्रार्थना
ऋग्वेद का यह मन्त्र युद्ध और आत्मरक्षा की भावना को व्यक्त करता है। इसमें साधक धनुष की प्रत्यञ्चा से अपने ऊपर प्रहार न करने की प्रार्थना करता है तथा इन्द्र से अपने शरीर को पत्थर के समान दृढ़ और शस्त्रों से अभेद्य बनाने की कामना करता है। साथ ही शत्रुओं और उनके द्वारा उत्पन्न द्वेष एवं अनिष्ट को दूर करने की प्रार्थना की गई है।
मन्त्र एवं पदपाठ
मन्त्र:
ज्याके परि णो नमाश्मानं तन्वं कृधि ।
वीडुर्वरीयोऽरातीरप द्वेषांस्या कृधि ॥२॥
पदपाठ:
ज्याके । परि । नः । नम । अश्मानम् । तन्वम् । कृधि ।
वीडुः । वरीयः । अरातीः । अप । द्वेषांसि । आ । कृधि ॥२॥
सरल हिन्दी अर्थ
हे कुत्सित प्रत्यञ्चा (धनुष की डोरी)! हमसे दूर मुड़ जाओ, अर्थात् हमारे ऊपर प्रहार करने वाले बाण को न चलाओ।
हे इन्द्र! हमारे शरीर को पत्थर के समान दृढ़ और अभेद्य बना दो। हे सेना को सुदृढ़ करने वाले इन्द्र! हमारे शत्रुओं तथा उनके द्वारा किए जाने वाले द्वेषपूर्ण और अप्रिय कार्यों को हमसे बहुत दूर कर दो।
मन्त्र का भावार्थ
इस मन्त्र में रक्षा, शारीरिक दृढ़ता और शत्रु-विनाश—इन तीन भावों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
सबसे पहले धनुष की प्रत्यञ्चा को सम्बोधित करके कहा गया है कि वह साधक से दूर हो जाए। इसके बाद इन्द्र से प्रार्थना की जाती है कि शरीर में ऐसी दृढ़ता उत्पन्न हो जाए कि वह पत्थर के समान अभेद्य बन जाए।
यहाँ “पत्थर का शरीर” कहने का आशय शाब्दिक रूप से मनुष्य के शरीर को पत्थर में बदलना नहीं है, बल्कि पत्थर के गुण—दृढ़ता, कठोरता और शस्त्रों से रक्षा—को शरीर में प्राप्त करना है।
अन्त में प्रार्थना है कि शत्रु और उनके द्वारा उत्पन्न द्वेष, अनिष्ट तथा अप्रिय कर्म साधक से बहुत दूर हो जाएँ।
अष्टाध्यायी के आधार पर प्रमुख व्याकरणिक विवेचन
१. ज्याके
ज्याके का अर्थ यहाँ धनुष की प्रत्यञ्चा/डोरी से लिया गया है। इसे उपद्रव का कारण मानकर कुत्सित अर्थ में ‘क’ प्रत्यय की व्युत्पत्ति बताई गई है। इसके सम्बन्ध में पाणिनीय सूत्र “कुत्सिते” (५.३.७४) का उल्लेख किया जाता है।
आमन्त्रित पद होने के कारण इसके स्वर-विचार में “आमन्त्रितस्य च” (६.१.१९८) सूत्र का प्रयोग बताया गया है।
२. तन्वम्
तन्वम् का अर्थ है—शरीर को।
यहाँ छान्दस प्रयोग के कारण स्वरूप-विचार में “तन्वादीनां छन्दसि बहुलम्” (६.४.८६) का उल्लेख किया जाता है।
३. कृधि
कृधि ‘डुकृञ् करणे’ धातु से बना है और इसका अर्थ है—करो अथवा बना दो।
यहाँ लोट् लकार का प्रयोग है। वैदिक प्रयोग में “बहुलं छन्दसि” (२.४.७३) तथा “श्रुशृणुपॄकृवृभ्यश्छन्दसि” (६.४.१०२) आदि सूत्रों के आधार पर इसके रूप की व्याख्या की जाती है।
४. वीडुः
वीडुः के सम्बन्ध में यास्काचार्य के निरुक्त में ऐसा अर्थ मिलता है जो सेना को सुदृढ़ करने वाले से सम्बन्धित है। इस मन्त्र में यह विशेषण इन्द्र के लिए प्रयुक्त माना गया है।
५. वरीयः
वरीयः का अर्थ है—अत्यन्त दूर अथवा अधिक विस्तृत रूप से दूर।
इसकी व्युत्पत्ति उरु (विस्तृत) शब्द से ईयसुन् प्रत्यय के द्वारा मानी गई है। पाणिनि के “प्रियस्थिर…” (६.४.१५७) सूत्र के आधार पर उरु के स्थान पर वरादेश की व्याख्या की जाती है।
६. अरातीः
अरातीः का अर्थ है—शत्रुओं को अथवा विरोधी शक्तियों को।
इसकी व्युत्पत्ति ‘रा दाने’ धातु से क्तिच् प्रत्यय के द्वारा बताई जाती है। यहाँ वैदिक/छान्दस प्रयोग के कारण लौकिक संस्कृत से भिन्न रूप दिखाई देता है।
“अश्मानं तन्वं कृधि” का विशेष अर्थ
मन्त्र का सबसे ध्यान आकर्षित करने वाला अंश है—
“अश्मानं तन्वं कृधि”
अर्थात्—“हमारे शरीर को पत्थर के समान बना दो।”
सायणाचार्य के भाष्य में यहाँ स्वाभाविक शंका उत्पन्न होती है कि मनुष्य का हाड़-मांस से बना शरीर वास्तविक रूप से पत्थर कैसे बन सकता है?
इसका समाधान लक्षणा-वृत्ति के आधार पर किया जाता है।
सायणाचार्य द्वारा उद्धृत मीमांसा-दृष्टान्त “यजमानः प्रस्तरः” में भी यजमान और प्रस्तर को एक नहीं माना जाता। वहाँ प्रस्तर में यजमान से सम्बन्धित किसी साधक-गुण का आरोप/लक्षणात्मक प्रयोग समझा जाता है।
इसी प्रकार इस मन्त्र में शरीर को “अश्मन्” अर्थात् पत्थर कहने का आशय यह है कि शरीर में पत्थर जैसी दृढ़ता और शस्त्र-अभेद्यता उत्पन्न हो।
अर्थात् भाव यह है—
“हे इन्द्र! हमारे शरीर को इतना दृढ़ और सुरक्षित कर दो कि शत्रुओं के अस्त्र-शस्त्र उसे भेद न सकें।”
मन्त्र का विनियोग
यह मन्त्र संग्राम एवं आत्मरक्षा से सम्बन्धित माना जाता है। इसका विनियोग विजय की कामना तथा शत्रुओं के अस्त्रों से रक्षा के लिए इन्द्र की प्रार्थना में किया जाता है।
मन्त्र का व्यापक संदेश केवल बाहरी युद्ध तक सीमित नहीं माना जा सकता। प्रतीकात्मक दृष्टि से यह मनुष्य के भीतर दृढ़ता, साहस और प्रतिकूल शक्तियों से रक्षा की भावना भी उत्पन्न करता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का यह मन्त्र मनुष्य की सुरक्षा और विजय की प्राचीन वैदिक भावना को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। धनुष की प्रत्यञ्चा से रक्षा, शरीर को पत्थर के समान दृढ़ बनाने और शत्रुओं के द्वेष को दूर करने की प्रार्थना—ये सभी मिलकर साहस, सुरक्षा और अजेयता का भाव उत्पन्न करते हैं।
मुख्य भाव:
“शरीर में दृढ़ता हो, शत्रु के अस्त्र निष्फल हों और सभी अनिष्टकारी शक्तियाँ हमसे दूर रहें।”

