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अथर्ववेद १.३.१

मूत्र-विनिरोध की वैदिक चिकित्सा, मन्त्रार्थ एवं सायणभाष्य का विश्लेषण

भूमिका

अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त में ऐसे मन्त्र प्राप्त होते हैं जिनका सम्बन्ध शरीर में उत्पन्न मूत्र-विनिरोध तथा उससे सम्बद्ध रोगावस्था के निवारण से जोड़ा गया है। इस सूक्त का विशेष महत्त्व इसलिए है कि इसमें मन्त्रार्थ, सायणाचार्य की व्याख्या तथा कौशिकसूत्र में वर्णित विनियोग—तीनों के माध्यम से वैदिक चिकित्सा-परम्परा का एक विशिष्ट स्वरूप दिखाई देता है।

इस लेख में अथर्ववेद १.३.१ के मन्त्र का पदच्छेद, शब्दार्थ, भावार्थ, सायणभाष्य तथा कौशिकसूत्रीय विनियोग का क्रमबद्ध अध्ययन किया गया है।

महत्त्वपूर्ण सूचना: कौशिकसूत्र में वर्णित प्राचीन चिकित्सा-विधियों को यहाँ ऐतिहासिक एवं वैदिक चिकित्सा-परम्परा के अध्ययन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आधुनिक समय में मूत्रमार्ग में किसी उपकरण को स्वयं प्रविष्ट करना सुरक्षित उपचार नहीं है; मूत्र रुकने की स्थिति में योग्य चिकित्सक की सहायता आवश्यक है।


१. मूल मन्त्र

अथर्ववेद १.३.१

विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं शतवृष्ण्यम् ।
तेना ते तन्वे शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति ॥१॥

यह मन्त्र सूक्त के चिकित्सकीय प्रसंग में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसमें शर, पर्जन्य, निषेचन तथा शरीर से अवरोधित द्रव के बाहर निकलने की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।


२. मन्त्र-पद एवं शब्दार्थ

विद्मा

विद्मा — हम जानते हैं, हम भली-भाँति जानते हैं।

यह √विद् धातु से सम्बद्ध वैदिक प्रयोग है।

शरस्य

शरस्य — शर का, अर्थात् शर के सम्बन्ध में।

‘शर’ शब्द का सामान्य अर्थ बाण है, किन्तु इस सूक्त के चिकित्सकीय विनियोग में शर का सम्बन्ध सरकण्डे अथवा नली के रूप में प्रयुक्त पदार्थ से भी जोड़ा गया है।

पितरम्

पितरम् — पिता, उत्पन्न करने वाला अथवा पालन करने वाला।

पर्जन्यम्

पर्जन्यम् — पर्जन्य देव, अर्थात् वर्षा के देवता।

पर्जन्य वैदिक साहित्य में वर्षा, जल और जीवन-पोषण से सम्बद्ध देवता हैं।

शतवृष्ण्यम्

शतवृष्ण्यम् — अत्यन्त अथवा अनेक प्रकार की शक्ति से युक्त; प्रचुर सामर्थ्य वाला।

सायणाचार्य इसकी व्याख्या पर्जन्य की व्यापक उत्पादक एवं पोषक शक्ति के संदर्भ में करते हैं।

तेना

तेना — उस द्वारा, उस साधन के द्वारा।

यहाँ ‘शर’ से सम्बन्धित साधन की ओर संकेत माना गया है।

ते

ते — तुम्हारा / तुम्हारे लिए।

तन्वे

तन्वे — शरीर के लिए अथवा शरीर के सम्बन्ध में।

यहाँ विभक्ति का वैदिक विशेष प्रयोग माना गया है।

शम्

शम् — शान्ति, उपशमन, रोग-निवारण।

सायणाचार्य यहाँ शम् का सम्बन्ध रोग के उपशमन से करते हैं।

करम्

करम् — मैं करता हूँ।

अर्थात् “मैं तुम्हारे शरीर के लिए शान्ति/रोगोपशमन करता हूँ।”

पृथिव्याम्

पृथिव्याम् — पृथ्वी पर, भूमि पर।

निषेचनम्

निषेचनम् — बाहर की ओर स्रवण, निकलना अथवा प्रवाहित होना।

चिकित्सकीय प्रसंग में यह रुके हुए मूत्र के बाहर निकलने के अर्थ में लिया जाता है।

बहिः

बहिः — बाहर।

अस्तु

अस्तु — हो जाए।

बाल्

बाल् — सायण के अनुसार इसे ध्वन्यनुकरणात्मक शब्द के रूप में लिया जा सकता है, अर्थात् बाहर निकलते हुए द्रव की ध्वनि का बोधक।

सायण इसकी एक वैकल्पिक व्युत्पत्तिपरक व्याख्या भी प्रस्तुत करते हैं, जिसमें जीवन/प्राण की रक्षा का भाव ग्रहण किया जाता है।


३. मन्त्र का अन्वय

मन्त्र का भावानुसार अन्वय इस प्रकार समझा जा सकता है—

शरस्य पितरं शतवृष्ण्यं पर्जन्यं विद्मा।
तेन ते तन्वे शं करम्।
पृथिव्यां ते निषेचनं बहिः अस्तु।

अर्थात् शर के पिता, अत्यन्त सामर्थ्यवान पर्जन्य को हम जानते हैं। उस साधन के द्वारा तुम्हारे शरीर के लिए मैं शान्ति/रोगोपशमन करता हूँ। तुम्हारा अवरोधित स्राव पृथ्वी पर बाहर की ओर प्रवाहित हो।


४. मन्त्र का हिन्दी भावार्थ

हम उस शर के पिता, अत्यन्त सामर्थ्यवान एवं जीवन-पोषक पर्जन्य को जानते हैं। उसी शर के द्वारा मैं तुम्हारे शरीर के लिए रोग-उपशमन करता हूँ। तुम्हारा रुका हुआ मूत्र पृथ्वी पर भली-भाँति बाहर निकल जाए और शरीर के भीतर का अवरोध दूर होकर वह बाहर प्रवाहित हो।

यहाँ मन्त्र का प्रमुख भाव अवरोध के हटने और शरीर से रुके हुए द्रव के बाहर निकलने की कामना है।


५. सायणाचार्य की व्याख्या

सायणाचार्य मन्त्र की व्याख्या में ‘शरस्य पितरम्’ को पर्जन्य से सम्बद्ध करते हैं।

उनके अनुसार पर्जन्य वर्षा के माध्यम से वनस्पतियों, वृक्षों, झाड़ियों तथा विभिन्न स्थावर-जङ्गम प्राणियों के पोषण एवं उत्पत्ति में समर्थ है। इसलिए उसे ‘पिता’ कहा गया है।

शतवृष्ण्यम् के द्वारा उसकी व्यापक उत्पादक शक्ति का संकेत किया गया है।

इसके बाद मन्त्र का चिकित्सकीय पक्ष सामने आता है—

“तेना ते तन्वे शं करम्”

अर्थात् उस साधन के द्वारा रोगी के शरीर के लिए शान्ति अथवा रोगोपशमन किया जाता है।

इसके पश्चात्—

“पृथिव्यां ते निषेचनम्”

में शरीर के भीतर अवरुद्ध द्रव के पृथ्वी की ओर प्रवाहित होने की कामना व्यक्त होती है।

सायणाचार्य ‘बाल्’ को ध्वन्यनुकरणात्मक रूप में भी ग्रहण करते हैं। अर्थात् बाहर निकलते हुए द्रव की ध्वनि का बोध इसमें हो सकता है।

वैकल्पिक रूप से वे इसे जीवन से सम्बद्ध अर्थ में भी ग्रहण करते हैं—अर्थात् अवरोध दूर होकर रोगी के प्राणों की रक्षा हो।


६. कौशिकसूत्र में मन्त्र का विनियोग

इस सूक्त का विशेष महत्त्व कौशिकसूत्र के विनियोग से स्पष्ट होता है।

कौशिकसूत्रीय परम्परा में इस सूक्त का प्रयोग मूत्र एवं मल के अवरोध तथा उदावर्त जैसी रोगावस्थाओं के निवारण से सम्बद्ध बताया गया है।

प्राचीन चिकित्सा-विधान में विभिन्न औषधीय पदार्थों, पेय तथा शारीरिक क्रियाओं का प्रयोग वर्णित है।

इनमें परम्परागत रूप से निम्न प्रकार के उपायों का उल्लेख मिलता है—

  • हरीतकी आदि पदार्थों का प्रयोग।
  • विभिन्न वनस्पति एवं मिट्टी से तैयार पेय/काढ़े का प्रयोग।
  • दही अथवा मट्ठे जैसे पदार्थों का उपयोग।
  • रोगी को घोड़े अथवा हाथी आदि पर चलाना।
  • शारीरिक गति एवं व्यायाम कराना।
  • शर/सरकण्डे जैसे साधन का प्रयोग।
  • अन्य उपकरणों द्वारा अवरोध दूर करने का प्रयास।
  • कुछ मन्त्रों के साथ बस्ति-कर्म का विधान।

इन उपायों को प्राचीन वैदिक चिकित्सा-पद्धति के ऐतिहासिक विवरण के रूप में समझना चाहिए।


७. ‘शर’ का विशेष महत्त्व

इस मन्त्र का सबसे रोचक शब्द शर है।

सामान्य संस्कृत में—

शर = बाण

होता है।

लेकिन ‘शर’ शब्द का सम्बन्ध सरकण्डे से भी है। सरकण्डे का खोखला, नली-जैसा स्वरूप चिकित्सकीय विनियोग में विशेष अर्थ उत्पन्न करता है।

इसी कारण इस मन्त्र के सन्दर्भ में ‘शर’ को केवल युद्ध में प्रयुक्त बाण मानना पर्याप्त नहीं है।

यहाँ दो स्तर अलग-अलग रखने चाहिए—

मन्त्रार्थ

मन्त्र में ‘शर’ का काव्यात्मक एवं वैदिक अर्थ है।

कौशिकसूत्रीय विनियोग

चिकित्सकीय प्रयोग में उसी शब्द/पदार्थ का व्यावहारिक उपयोग बताया गया है।

इसलिए आधुनिक “catheter” शब्द को मन्त्र का प्रत्यक्ष अनुवाद कहना उचित नहीं होगा। अधिक सावधानी से यह कहा जा सकता है कि कौशिकसूत्रीय चिकित्सा-विधान में नली-सदृश साधन के प्रयोग का वर्णन मिलता है।


८. ‘पर्जन्य’ और ‘निषेचन’ का सम्बन्ध

मन्त्र में पर्जन्य का उल्लेख केवल धार्मिक देवता के रूप में नहीं, बल्कि जल और जीवन-पोषण के व्यापक वैदिक प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है।

पर्जन्य—

वर्षा → जल → वनस्पति → जीवन-पोषण

की वैदिक अवधारणा से जुड़ा है।

दूसरी ओर—

निषेचन → द्रव का प्रवाह → अवरोध का हटना

मन्त्र के चिकित्सकीय भाव को व्यक्त करता है।

इस प्रकार मन्त्र में जल, प्रवाह और जीवन-पोषण की वैदिक अवधारणाएँ चिकित्सकीय प्रयोजन से जुड़ती हुई दिखाई देती हैं।


९. ‘बाल्’ शब्द का विशेष विश्लेषण

मन्त्र के अन्त में आने वाला “बाल्” विशेष ध्यान देने योग्य है।

सायणाचार्य इसकी दो प्रकार से व्याख्या करते हैं।

१. ध्वन्यनुकरणात्मक अर्थ

‘बाल्’ को ऐसी ध्वनि माना जा सकता है जो बाहर निकलते हुए द्रव के वेग अथवा उसके गिरने की आवाज का अनुकरण करती है।

यह व्याख्या मन्त्र के तत्काल चिकित्सकीय प्रसंग से मेल खाती है।

२. जीवन-संरक्षण से सम्बन्धित अर्थ

सायणाचार्य वैकल्पिक रूप से इसे बल/प्राण से सम्बन्धित अर्थ में भी देखते हैं।

इस दृष्टि से मन्त्र का भाव होगा—

अवरोध दूर हो, द्रव बाहर निकले और रोगी के प्राण सुरक्षित रहें।

इस प्रकार ‘बाल्’ केवल ध्वनि का संकेत नहीं रह जाता, बल्कि जीवन-रक्षा की कामना से भी जुड़ जाता है।


१०. व्याकरणिक विश्लेषण

सायणभाष्य में विभिन्न पदों की व्युत्पत्ति एवं वैदिक व्याकरण की दृष्टि से विवेचना मिलती है।

शतवृष्ण्यम्

यह पद √वृष् — सेचने धातु से सम्बन्धित माना गया है।

वर्षा करने वाला अथवा शक्ति से सम्पन्न होने का भाव इसमें निहित है।

सायणभाष्य में उणादि तथा पाणिनीय व्याकरण के आधार पर इसकी सिद्धि का विवेचन मिलता है।


तेना तथा विद्मा

वैदिक संहिता में स्वर तथा रूप के कुछ विशेष प्रयोग सामान्य लौकिक संस्कृत से भिन्न दिखाई देते हैं।

“अन्येषामपि दृश्यते” (पा. ६.३.१३७) जैसे सूत्रों के आधार पर छान्दस प्रयोगों को समझा जाता है।

इसलिए इन पदों को केवल लौकिक संस्कृत के नियमों से समझना पर्याप्त नहीं है।


तन्वे

तनु शब्द से सम्बन्धित यह रूप वैदिक प्रयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

यहाँ विभक्ति का प्रयोग सामान्य अपेक्षा से भिन्न अर्थ-संबंध को व्यक्त करता है।

सायणाचार्य इसे शरीर के अर्थ में ग्रहण करते हैं।


शम्

√शम् — उपशमने

से सम्बन्धित पद है।

इसका मूल भाव है—

शान्ति, उपशमन, शमन।

चिकित्सकीय सन्दर्भ में इसका अर्थ रोग अथवा पीड़ा के शमन से जुड़ता है।


करम्

√कृ — करणे

से सम्बन्धित रूप है।

वैदिक प्रयोग में लकार तथा आगम आदि के कारण इसका रूप सामान्य संस्कृत से भिन्न दिखाई देता है।

अर्थ—

मैं करता हूँ।

यहाँ कर्ता द्वारा रोगोपशमन करने की अभिप्रेरणा व्यक्त होती है।


पृथिव्याम्

पृथिवी शब्द का सप्तमी एकवचन रूप है—

पृथिव्याम् = पृथ्वी पर।

मन्त्र में इसका सम्बन्ध निषेचन अर्थात् शरीर से बाहर निकलकर पृथ्वी पर गिरने से है।


निषेचनम्

यह पद नि + √सिच् (सिञ्च्) से सम्बन्धित है।

भाववाचक प्रयोग में इसका अर्थ—

स्रवण, प्रवाह, बाहर निकलना

ग्रहण किया जाता है।

इस मन्त्र के चिकित्सकीय सन्दर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण पद है।


११. मन्त्र का चिकित्सकीय भाव

यदि मन्त्र को उसके कौशिकसूत्रीय विनियोग के साथ पढ़ा जाए तो उसका मुख्य चिकित्सकीय भाव इस प्रकार दिखाई देता है—

रुका हुआ द्रव → अवरोध का निवारण → प्रवाह की पुनः स्थापना → रोगी के शरीर में शान्ति।

अर्थात् मन्त्र में केवल देवता की स्तुति नहीं है, बल्कि विशिष्ट चिकित्सकीय प्रयोजन के साथ शरीर में अवरुद्ध प्रवाह के पुनः आरम्भ होने की कामना भी व्यक्त की गई है।


१२. आधुनिक चिकित्सा से तुलना

प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित नली, शलाका अथवा अन्य उपकरणों की चर्चा को देखकर आधुनिक urinary catheterization से समानता दिखाई दे सकती है।

किन्तु दोनों को पूर्णतः समान मानना उचित नहीं है।

आधुनिक चिकित्सा में catheterization—

  • चिकित्सकीय रूप से निर्धारित प्रक्रिया है।
  • बाँझ (sterile) उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
  • प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा किया जाता है।
  • संक्रमण, चोट और अन्य जटिलताओं से बचाव के लिए नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाता है।

इसलिए अथर्ववेद या कौशिकसूत्र में वर्णित प्राचीन विधियों को आधुनिक उपचार के निर्देश के रूप में नहीं लेना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति को अचानक मूत्र बिल्कुल नहीं निकल रहा हो, पेट के निचले भाग में तेज दर्द/फूलाव हो या मूत्र रुक गया हो, तो यह चिकित्सकीय आपातस्थिति हो सकती है और तत्काल चिकित्सकीय सहायता आवश्यक है।


१३. वैदिक चिकित्सा-परम्परा के अध्ययन में इस मन्त्र का महत्त्व

अथर्ववेद १.३.१ की विशेषता तीन स्तरों के समन्वय में है—

१. मन्त्र

मन्त्र रोग से मुक्ति और शरीर में रुके हुए प्रवाह के बाहर निकलने की कामना करता है।

२. सायणभाष्य

सायणाचार्य मन्त्र के शब्दों, देवता-संबंध और चिकित्सकीय अर्थ की व्याख्या करते हैं।

३. कौशिकसूत्र

मन्त्र के वास्तविक विनियोग और उससे जुड़े उपचारात्मक कर्मों का विवरण देता है।

इन तीनों को साथ पढ़ने पर वैदिक चिकित्सा-साहित्य की संरचना को अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।


१४. निष्कर्ष

अथर्ववेद १.३.१ का यह मन्त्र प्राचीन भारतीय चिकित्सा-परम्परा के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

मन्त्र में शर, पर्जन्य, शम् और निषेचन जैसे पदों के माध्यम से रोग-निवारण, प्रवाह और जीवन-पोषण की अवधारणाएँ सामने आती हैं।

सायणाचार्य ने इसके शब्दों की दार्शनिक, व्याकरणिक और चिकित्सकीय व्याख्या की है, जबकि कौशिकसूत्र में इसके विशिष्ट विनियोग का वर्णन मिलता है।

विशेष रूप से “पृथिव्यां ते निषेचनम्” में शरीर के भीतर रुके हुए द्रव के बाहर निकलने की स्पष्ट कामना दिखाई देती है।

इस मन्त्र का अध्ययन यह भी दिखाता है कि अथर्ववैदिक परम्परा में मन्त्र, औषधि, कर्म और रोग-विशेष के बीच एक व्यवस्थित सम्बन्ध स्थापित किया गया था।

अतः अथर्ववेद १.३.१ को केवल एक धार्मिक मन्त्र के रूप में न देखकर वैदिक भाषा, मन्त्रविज्ञान, सायणभाष्य तथा प्राचीन चिकित्सा-परम्परा—इन चारों के संयुक्त अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जा सकता है।

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