मूत्र-विनिरोध की वैदिक चिकित्सा, मन्त्रार्थ एवं सायणभाष्य का विश्लेषण
अथर्ववेद १.३.२ का यह मन्त्र मूत्र-विसर्जन में उत्पन्न कठिनाई अथवा अवरोध के सन्दर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस मन्त्र में मित्र, शर, शरीर का कल्याण तथा निषेचन (स्राव/प्रवाह) जैसे पद आते हैं। कौशिकसूत्र में इस सूक्त के चिकित्सकीय प्रयोग का उल्लेख मिलने से यह मन्त्र वैदिक चिकित्सा-परम्परा के अध्ययन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
विद्मा शरस्य पितरं मित्रं शतवृष्ण्यम् ।
तेना ते तन्वे शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति ॥२॥
१. मन्त्र का पदपाठ
विद्म । शरस्य । पितरम् । मित्रम् । शतऽवृष्ण्यम् ।
तेन । ते । तन्वे । शम् । करम् । पृथिव्याम् । ते । निऽसेचनम् । बहिः । ते । अस्तु । बाल् । इति ॥
२. सरल भावार्थ
हम शर के पिता, मित्र तथा अनेक शक्तियों से सम्पन्न देवता को जानते हैं। उसी के द्वारा मैं तुम्हारे शरीर के लिए कल्याण करता हूँ। तुम्हारा निषेचन पृथ्वी पर, शरीर से बाहर, “बाल्” ध्वनि के साथ हो।
मन्त्र का चिकित्सकीय सन्दर्भ देखते हुए इसका आशय रुके हुए अथवा कठिनाई से निकलने वाले मूत्र के पुनः बाहर प्रवाहित होने की कामना से सम्बन्धित माना जा सकता है।
३. प्रमुख शब्दों का अर्थ
विद्म
विद्म √विद् “जानना” धातु से बना हुआ प्रथम पुरुष नहीं, बल्कि उत्तम पुरुष बहुवचन का रूप है।
अर्थ — हम जानते हैं।
शरस्य
शरस्य — “शर” शब्द की षष्ठी एकवचन।
अर्थ — शर का।
यहाँ “शर” का सम्बन्ध सरकण्डे अथवा शर-नामक वनस्पति से लिया गया है।
पितरम्
पितरम् — “पितृ” शब्द का द्वितीया एकवचन।
अर्थ — पिता, उत्पादक या उत्पत्ति का कारण।
मित्रम्
मित्रम् — मित्र देवता का द्वितीया एकवचन।
वैदिक साहित्य में मित्र एक विशिष्ट देवता हैं। सायणाचार्य की व्याख्या में उनका सम्बन्ध दिन तथा प्राकृतिक वर्षा-चक्र से जोड़ा गया है।
शतवृष्ण्यम्
यह पद अनेक शक्तियों अथवा सामर्थ्य से सम्पन्न होने का बोध कराता है।
अर्थ — बहुशक्ति-संपन्न, अनेक प्रकार की शक्ति वाला।
तेन
तेन — तृतीया एकवचन।
अर्थ — उसके द्वारा।
तन्वे
तन्वे — “तनु” अर्थात् शरीर के लिए।
अर्थ — शरीर के लिए।
शम्
शम् — कल्याण, सुख, शान्ति।
करम्
√कृ धातु से सम्बन्धित।
सन्दर्भानुसार — कल्याण करता हूँ / कल्याणकारी बनाता हूँ।
निषेचनम्
नि + √सिच् से सम्बन्धित पद।
अर्थ — स्राव, प्रवाह अथवा बाहर निकलना।
चिकित्सकीय सन्दर्भ में इसे मूत्र के प्रवाह से जोड़कर समझा जाता है।
बहिः
अर्थ — बाहर।
अस्तु
√अस् धातु का लोट्-लकार रूप।
अर्थ — हो, होने दे।
बाल् इति
मन्त्र के अन्त में “बाल् इति” विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसे एक ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में समझा जा सकता है।
अर्थात् मन्त्र में बाहर निकलने वाले द्रव के प्रवाह को एक ध्वनि द्वारा व्यक्त किया गया है।
४. सायणाचार्य की व्याख्या
सायणाचार्य के अनुसार यहाँ मित्र देवता का सम्बन्ध दिन से है।
मित्र को सभी प्राणियों के हितकारी होने के कारण “मित्र” कहा गया है। सायणाचार्य इस प्रसंग में वैदिक साहित्य के उन अंशों का भी उल्लेख करते हैं जिनमें मित्र का सम्बन्ध दिन तथा वरुण का सम्बन्ध रात्रि से किया गया है।
मित्र का सम्बन्ध वर्षा-चक्र से स्थापित करते हुए सायणाचार्य “शर” की उत्पत्ति के साथ भी उनका सम्बन्ध बताते हैं। इस प्रकार “शरस्य पितरम् मित्रम्” में मित्र को शर का उत्पादक अथवा कारण माना गया है।
सायण की व्याख्या का व्यापक भाव यह है कि प्राकृतिक जगत में सूर्य, दिन, पर्जन्य और वनस्पति के बीच एक कारण-सम्बन्ध देखा जाता है।
५. कौशिकसूत्र में चिकित्सकीय विनियोग
इस मन्त्र की विशेषता यह है कि इसका प्रयोग केवल मन्त्रार्थ तक सीमित नहीं दिखाई देता, बल्कि कौशिकसूत्र में इसके चिकित्सकीय विनियोग का उल्लेख मिलता है।
उद्धृत पाठ है—
“विद्मा शरस्येति मूत्रकृच्छ्रिणं पाययति।”
अर्थात् “विद्मा शरस्य…” मन्त्र का प्रयोग मूत्रकृच्छ्र से पीड़ित व्यक्ति के उपचार-सन्दर्भ में किया जाता है।
इसी प्रकार एक अन्य प्रयोग में कहा गया है—
“शरनाल्या बस्तिबिलं विवृणोति।”
यहाँ शरनाली तथा बस्तिबिल का उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इससे यह संकेत मिलता है कि शर/सरकण्डे से बनी नली का उपयोग मूत्रमार्ग के मार्ग को खोलने के उपचार-सन्दर्भ में किया जाता था।
६. क्या यह आधुनिक कैथेटर जैसा था?
यहाँ ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
कौशिकसूत्र में वर्णित शरनाली द्वारा बस्तिबिल खोलने की प्रक्रिया कार्य की दृष्टि से आधुनिक urinary catheterisation से समानता रखती है, क्योंकि दोनों का उद्देश्य मूत्र के अवरोधित मार्ग को खोलकर मूत्र को बाहर निकालना है।
लेकिन दोनों को पूर्णतः एक ही चिकित्सा-तकनीक कहना उचित नहीं होगा।
इसलिए अधिक वैज्ञानिक निष्कर्ष यह है:
कौशिकसूत्र में वर्णित शरनाली-प्रयोग को आधुनिक urinary catheterisation के साथ कार्यात्मक समानता रखने वाली एक प्राचीन शल्य-पद्धति के रूप में देखा जा सकता है।
यह कथन उपलब्ध पाठ-साक्ष्य की सीमा के भीतर अधिक उपयुक्त है।
७. “बाल्” ध्वनि का महत्व
मन्त्र का अन्तिम पद—
बाल् इति
विशेष ध्यान देने योग्य है।
इसे मूत्र अथवा द्रव के वेगपूर्वक बाहर निकलने की ध्वनि के प्रतीकात्मक/ध्वन्यात्मक प्रयोग के रूप में समझा जा सकता है।
इस प्रकार मन्त्र में केवल “मूत्र बाहर निकले” की कामना ही नहीं है, बल्कि अवरोध हटने और प्रवाह पुनः स्थापित होने की एक सजीव ध्वन्यात्मक कल्पना भी दिखाई देती है।
हालाँकि “बाल्” का निश्चित आधुनिक अर्थ “छपाक” ही है, ऐसा कहना आवश्यक प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा। इसे ध्वन्यात्मक व्याख्या के रूप में रखना अधिक सुरक्षित है।
८. मन्त्र की व्याकरणिक संरचना
| पद | व्याकरण | अर्थ |
|---|---|---|
| विद्म | √विद्, उत्तम पुरुष बहुवचन | हम जानते हैं |
| शरस्य | षष्ठी एकवचन | शर का |
| पितरम् | द्वितीया एकवचन | पिता/उत्पादक |
| मित्रम् | द्वितीया एकवचन | मित्र देव |
| शतवृष्ण्यम् | विशेषण | अनेक शक्तियों वाला |
| तेन | तृतीया एकवचन | उसके द्वारा |
| ते | सर्वनाम | तुम्हारे/तुम्हारा |
| तन्वे | चतुर्थी एकवचन | शरीर के लिए |
| शम् | कल्याणार्थक | सुख/कल्याण |
| करम् | √कृ से सम्बन्धित | करता हूँ |
| पृथिव्याम् | सप्तमी एकवचन | पृथ्वी पर |
| निषेचनम् | नि + √सिच् | स्राव/प्रवाह |
| बहिः | अव्यय | बाहर |
| अस्तु | √अस्, लोट् | हो |
| बाल् इति | ध्वन्यात्मक प्रयोग | “बाल्” |

