रोग और आस्राव की निवृत्ति में मुञ्ज का वैदिक प्रयोग
अथर्ववेद — प्रथम काण्ड, प्रथम अनुवाक, द्वितीय सूक्त, चतुर्थ मन्त्र
अथर्ववेद में मानव-जीवन से जुड़े रोग, स्वास्थ्य, औषधि, शान्ति और रोग-निवारण के अनेक मन्त्र प्राप्त होते हैं। द्वितीय सूक्त का चतुर्थ मन्त्र भी इसी चिकित्सा-परम्परा से सम्बन्धित है। इस मन्त्र में रोग तथा आस्राव की निवृत्ति के लिए मुञ्ज का उल्लेख किया गया है।
मन्त्र
यथा द्यां च पृथिवीं चान्तस्तिष्ठति तेजनम् ।
एवा रोगं चास्रावं चान्तस्तिष्ठतु मुञ्ज इत् ॥४॥
पदपाठ
यथा । द्याम् । च । पृथिवीम् । च । अन्तः । तिष्ठति । तेजनम् । एव । रोगम् । च । आऽस्रावम् । च । अन्तः । तिष्ठतु । मुञ्जः । इत् ॥
सरल भावार्थ
जिस प्रकार तेजन द्युलोक और पृथ्वी के मध्य स्थित रहता है, उसी प्रकार मुञ्ज रोग और आस्राव के मध्य स्थित होकर उन्हें रोकने वाला हो।
अर्थात् मन्त्र में ऐसी कामना की गई है कि जिस प्रकार कोई वस्तु दो स्थानों के मध्य दृढ़ता से स्थित होकर अवरोध अथवा धारण का कार्य करती है, उसी प्रकार मुञ्ज रोग और शरीर से होने वाले अत्यधिक स्राव को रोकने में सहायक हो।
प्रमुख शब्दों का अर्थ
यथा — जिस प्रकार।
द्याम् च पृथिवीम् च — द्युलोक और पृथ्वी को।
अन्तः — मध्य में।
तिष्ठति — स्थित रहता है।
तेजनम् — भाष्यपरम्परा में बाँस अथवा दृढ़ दण्ड-सदृश वस्तु के अर्थ में व्याख्यायित।
रोगम् — रोग, व्याधि अथवा शारीरिक पीड़ा।
आस्रावम् — निरन्तर होने वाला स्राव अथवा बहाव।
मुञ्जः — मुञ्ज नामक तृण; इससे बनी डोरी या मेखला का भी प्रयोग वैदिक कर्मकाण्ड में मिलता है।
इत् — ही, निश्चयपूर्वक।
सायणाचार्य की व्याख्या
सायणाचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए इसके उपमान और उपमेय के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं। मन्त्र में पहले द्युलोक और पृथ्वी के मध्य स्थित तेजन का उदाहरण दिया गया है और उसके बाद उसी प्रकार मुञ्ज के रोग एवं आस्राव के मध्य स्थित होने की कामना की गई है।
यहाँ मुख्य भाव धारण और अवरोध का है।
जिस प्रकार कोई दृढ़ वस्तु दो स्थितियों के मध्य रहकर अपने स्थान को धारण करती है, उसी प्रकार मुञ्ज को रोग-निवारण की वैदिक क्रिया में प्रयुक्त करने की कल्पना की गई है।
सायणभाष्य में रोग और आस्राव के पृथक् उल्लेख पर भी विचार मिलता है। सामान्यतः रोग शब्द व्यापक अर्थ रखता है और उसमें अनेक प्रकार की व्याधियाँ सम्मिलित हो सकती हैं। फिर भी यहाँ आस्राव का अलग से उल्लेख किया गया है।
इसका उद्देश्य मन्त्र के विशेष प्रयोग की ओर संकेत करना माना गया है—अर्थात् इस क्रिया का विशेष सम्बन्ध शरीर से होने वाले असामान्य स्राव की निवृत्ति से है।
पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि
यह मन्त्र केवल चिकित्सा-विनियोग की दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसमें वैदिक भाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ भी दिखाई देती हैं।
1. द्याम् और पृथिवीम्
मन्त्र में—
द्याम् च पृथिवीम् च अन्तः
का प्रयोग हुआ है। वैदिक भाषा में विभक्ति-प्रयोग के अनेक छान्दस रूप मिलते हैं। सायणाचार्य यहाँ व्यत्यय की चर्चा करते हैं।
इस प्रकार मन्त्र का प्रयोग सामान्य लौकिक संस्कृत के प्रयोग से कुछ भिन्न वैदिक व्याकरणिक संरचना को प्रदर्शित करता है।
2. एवा
मन्त्र में पाठ है—
एवा
यहाँ एव निपात का वैदिक/छान्दस दीर्घरूप माना गया है। सायणाचार्य इसके सम्बन्ध में पाणिनीय सूत्र—
“निपातस्य च” (अष्टाध्यायी 6.3.136)
का उल्लेख करते हैं।
3. रोगम्
रोग शब्द की व्युत्पत्ति रुज् धातु से सम्बन्धित मानी जाती है।
रुज् — पीड़ायाम् / भङ्गे
अर्थात् जो शरीर को पीड़ा या विकार उत्पन्न करे, वह रोग।
सायणपरम्परा में इसकी व्युत्पत्ति के लिए—
“हलश्च” (3.3.121)
आदि सूत्रों का प्रयोग किया गया है। धातु के जकार के स्थान पर गकार का आगम/परिवर्तन होने से रुज् → रोग रूप की व्याख्या की जाती है।
यह व्युत्पत्ति रोग शब्द के मूल अर्थ—विकार, पीड़ा और भंग—को भी स्पष्ट करती है।
“आस्राव” शब्द का व्याकरणिक विवेचन
आस्राव शब्द का सम्बन्ध आङ् + स्रु से माना जाता है।
स्रु धातु का मूल अर्थ है—बहना, प्रवाहित होना।
आङ् उपसर्ग के साथ—
आ + स्रु → आस्राव
का रूप सिद्ध होता है।
पाणिनीय व्याकरण में स्रु धातु से सम्बन्धित प्रत्यय-विधान के लिए—
“श्याद्व्यधास्रुसंस्रु…” (3.1.141)
सूत्र-परम्परा का उल्लेख मिलता है।
इस प्रकार आस्राव शब्द के भीतर ही बहने या प्रवाहित होने का मूल अर्थ निहित है।
यही कारण है कि मन्त्र में इसे रोग से अलग करके विशेष रूप से कहा गया है।
मुञ्ज का महत्त्व
मन्त्र का अन्तिम महत्वपूर्ण शब्द है—
“मुञ्ज इत्”
मुञ्ज एक प्रकार का तृण है। वैदिक और उत्तरवर्ती भारतीय परम्परा में मुञ्ज से डोरी, मेखला तथा विभिन्न उपयोगी वस्तुएँ बनाने का उल्लेख मिलता है।
इस मन्त्र में मुञ्ज का उल्लेख केवल वनस्पति के रूप में नहीं, बल्कि एक वैदिक उपचारात्मक क्रिया के उपकरण के रूप में समझा जाता है।
मन्त्र की कल्पना में मुञ्ज रोग और आस्राव के मध्य स्थित होकर रोकने और धारण करने का प्रतीक बनता है।
कौशिकसूत्र और मन्त्र का विनियोग
अथर्ववेद के मन्त्रों का वास्तविक प्रयोग समझने के लिए कौशिकसूत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें अथर्ववेद के अनेक मन्त्रों के कर्मकाण्डीय एवं उपचारात्मक विनियोगों का वर्णन मिलता है।
इस परम्परा में मुञ्ज से सम्बन्धित क्रियाओं का उल्लेख मिलता है और रोग-निवारण के लिए मन्त्र तथा कर्म के संयुक्त प्रयोग की वैदिक परम्परा सामने आती है।
इससे स्पष्ट होता है कि अथर्ववेद की चिकित्सा-परम्परा केवल मन्त्र-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें—
मन्त्र + औषधीय/प्राकृतिक पदार्थ + विशिष्ट कर्म
का संयुक्त स्वरूप दिखाई देता है।
वैदिक चिकित्सा-दृष्टि
इस मन्त्र का अध्ययन हमें प्राचीन भारतीय चिकित्सा-चिन्तन के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष से परिचित कराता है।
अथर्ववेद में रोग को केवल शारीरिक समस्या के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि रोग-निवारण के लिए प्रार्थना, मन्त्र, औषधि, प्राकृतिक पदार्थ और अनुष्ठान—इन सभी का समन्वय मिलता है।
यहाँ मुञ्ज का प्रयोग एक ऐसी वस्तु के रूप में सामने आता है जो धारण और अवरोध के प्रतीक से जुड़ी है।
इसी कारण मन्त्र में पहले एक प्राकृतिक उदाहरण दिया गया है और फिर उसी के आधार पर रोग-निवारण की कामना की गई है।
मन्त्र का मूल संदेश
इस मन्त्र का मूल भाव तीन शब्दों में समझा जा सकता है—
रोग — आस्राव — निवृत्ति
मन्त्रकार पहले एक प्राकृतिक स्थिति का उदाहरण प्रस्तुत करता है और फिर उसी प्रकार की स्थिरता एवं अवरोध की शक्ति रोग और आस्राव के संदर्भ में चाहता है।
इस दृष्टि से यह मन्त्र प्रकृति के निरीक्षण, प्रतीकात्मक चिकित्सा-विचार और मन्त्र-विनियोग—तीनों का सुंदर उदाहरण है।
आधुनिक दृष्टि से आवश्यक सावधानी
अथर्ववेद में रोग-निवारण सम्बन्धी मन्त्रों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व अत्यन्त महत्वपूर्ण है। परन्तु आधुनिक समय में अतिसार, अत्यधिक मूत्र-स्राव, निर्जलीकरण अथवा अन्य शारीरिक समस्याओं में केवल मन्त्र या मुञ्ज के प्रयोग को आधुनिक चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषकर अत्यधिक दस्त या शरीर से पानी की कमी होने पर जल एवं इलेक्ट्रोलाइट की पूर्ति तथा आवश्यकतानुसार योग्य चिकित्सक की सलाह महत्वपूर्ण है।
वैदिक मन्त्र का अध्ययन यहाँ मुख्यतः उसके ऐतिहासिक, भाषिक, दार्शनिक और वैदिक चिकित्सा-परम्परा के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
अथर्ववेद 1.2.4 का यह मन्त्र वैदिक साहित्य में रोग-निवारण की उस परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें प्रकृति, मन्त्र और उपचारात्मक कर्म एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
सायणाचार्य की व्याख्या मन्त्र के गूढ़ अर्थ को समझने में सहायता करती है, जबकि पाणिनीय व्याकरण रोग, आस्राव आदि शब्दों की भाषिक संरचना को समझने का मार्ग प्रदान करता है।
मन्त्र में प्रयुक्त मुञ्ज इस सम्पूर्ण उपचार-कल्पना का विशेष केन्द्र है—जो धारण, अवरोध और स्थिरता के भाव को व्यक्त करता है।
इस प्रकार यह छोटा-सा वैदिक मन्त्र भाषाशास्त्र, व्याकरण, वैदिक कर्मकाण्ड और प्राचीन चिकित्सा-चिन्तन—चारों दृष्टियों से अध्ययन योग्य है।
संदर्भ
- अथर्ववेद, काण्ड 1, सूक्त 2, मन्त्र 4
- सायणाचार्य भाष्य
- कौशिकसूत्र
- पाणिनि, अष्टाध्यायी
- वैदिक एवं निरुक्तीय व्याख्या-परम्परा

