आज का ऋग्वेद मन्त्र १.२.३ (1)

दैनिक ऋग्वेद मन्त्र

ऋग्वेद १.२.३

वायु देवता

मन्त्र

वायो॒ तव॑ प्रपृंच॒ती धेना॑ जिगाति दा॒शुषे॑ ।
उ॒रू॒ची सोम॑पीतये ॥३॥

ऋग्वेदः — मण्डल १, सूक्त २, मन्त्र ३


सरल भावार्थ

हे वायु! आपकी वाणी, जो उत्तम प्रकार से सम्पर्क कराने वाली तथा अनेक प्रकार के ज्ञान का बोध कराने वाली है, विद्या एवं यज्ञ के लिए पुरुषार्थ करने वाले मनुष्य तक पहुँचती है। वह सोम के रस, आनन्द और उसके श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है।

यह मन्त्र वायु, वाणी, ज्ञान और आनन्द के परस्पर सम्बन्ध को सुन्दर रूप से प्रस्तुत करता है।


पदार्थ — शब्दार्थ

वायो — हे वायु! हे वेदवाणी के प्रकाशक ईश्वर! हे प्राणवायु!

तव — तुम्हारी।

प्रपृञ्चती — उत्तम प्रकार से सम्पर्क कराने वाली; विस्तारपूर्वक जोड़ने वाली।

धेना — वाणी; वेदवाणी।

जिगाति — जाती है; प्राप्त होती है।

दाशुषे — दान देने वाले, हविष्य अर्पण करने वाले यजमान अथवा विद्या ग्रहण करने वाले पुरुषार्थी के लिए।

उरूची — बहुतों तक पहुँचने वाली; व्यापक ज्ञान कराने वाली।

सोमपीतये — सोमपान के लिए; उत्पन्न पदार्थों के रसपान एवं आनन्द की प्राप्ति के लिए।


आचार्यों के भाष्य एवं भावार्थ

१. आचार्य सायण का भाष्य

सायणाचार्य के कर्मकाण्डीय एवं आधियज्ञिक पक्ष के अनुसार—

हे वायुदेव! आपकी वह वाणी, जो अनेक सोमयाजी यजमानों के पास जाने वाली तथा सोम के गुणों का भली-भाँति वर्णन करने वाली है, हविष्य अर्पण करने वाले यजमान के पास सोमपान के लिए जाती है।

भावार्थ

यज्ञ के संदर्भ में वायु देवता और सोमयाग के बीच सम्बन्ध को इस मन्त्र द्वारा व्यक्त किया गया है। वाणी मानो यजमान को सोम के अर्पण और उसके ग्रहण की ओर प्रेरित करती है।


२. महर्षि दयानन्द सरस्वती का भाष्य

आध्यात्मिक पक्ष — ईश्वर एवं वेदवाणी

हे वेदवाणी के प्रकाशक जगदीश्वर! आपकी चारों वेदरूप वाणी समस्त विद्याओं से सम्पर्क कराने वाली और अनेक प्रकार के ज्ञान का बोध कराने वाली है। वह विद्या का दान करने वाले तथा निष्कपट भाव से विद्या ग्रहण करने वाले पुरुषार्थी मनुष्य को ज्ञान, आनन्द और श्रेष्ठ जीवनोपयोगी पदार्थों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है।

भौतिक पक्ष — वायु एवं वाणी

प्राणवायु के संयोग से मनुष्य की वाणी उत्पन्न होती है। वायु स्वर-तन्त्र के माध्यम से ध्वनि उत्पन्न करने में सहायक होती है और वही वाणी विभिन्न शब्दों तथा अर्थों का बोध कराती है।


वैज्ञानिक दृष्टिकोण

महर्षि दयानन्द सरस्वती के भौतिक भाष्य को आधुनिक ध्वनि-विज्ञान के दृष्टिकोण से देखने पर इस मन्त्र में वायु, वाणी और ध्वनि के सम्बन्ध की एक महत्वपूर्ण व्याख्या दिखाई देती है।

१. वायु एक माध्यम के रूप में

ध्वनि के प्रसार के लिए किसी भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है। सामान्य परिस्थितियों में मानव वाणी वायु के माध्यम से हमारे कानों तक पहुँचती है। पूर्ण निर्वात में सामान्य ध्वनि तरंगों का प्रसार नहीं होता।

२. स्वर की उत्पत्ति

मनुष्य के फेफड़ों से बाहर निकलने वाली वायु स्वर-तन्त्रियों के कम्पन में सहायक होती है। स्वर-तन्त्रियों के कम्पन से ध्वनि उत्पन्न होती है और मुख, जीभ तथा अन्य वाक्-अवयव उसे विभिन्न ध्वनियों और शब्दों में रूप देते हैं।

३. ध्वनि का प्रसार

उत्पन्न ध्वनि माध्यम में तरंगों के रूप में आगे बढ़ती है और श्रोता के कान तक पहुँचती है। इस प्रकार वायु मानव वाणी के उत्पादन और सामान्य वातावरण में उसके प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

नोट: आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ध्वनि की उत्पत्ति और उसके प्रसार में कई भौतिक प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। इसलिए वैदिक मन्त्र के पारम्परिक अर्थ और आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या को उनके-अपने संदर्भ में समझना उचित है।


व्याकरणिक व्युत्पत्ति

प्रपृञ्चती

प्र + पृच् धातु से निष्पन्न। इसमें शतृ् प्रत्यय का प्रयोग माना गया है। इसका अर्थ है—प्रकर्षेण सम्पर्क करने वाली अथवा जोड़ने वाली।

धेना

‘धेना’ का प्रयोग वैदिक साहित्य में वाणी के अर्थ में मिलता है। निघण्टु में इसे वाक् के पर्यायों में गिना गया है।

जिगाति

‘गा’ धातु से सम्बन्धित रूप। इसमें द्वित्व के कारण जिगाति रूप बनता है। इसका अर्थ है—जाता है अथवा गति करता है।

दाशुषे

दाश् धातु से सम्बन्धित शब्द। इसका अर्थ है—दान करने वाला अथवा अर्पण करने वाला। यहाँ चतुर्थी एकवचन में प्रयोग हुआ है।

उरूची

उरु + अञ्च् से सम्बन्धित व्युत्पत्ति। अर्थ—व्यापक रूप से जाने वाली, अनेक स्थानों तक पहुँचने वाली।

सोमपीतये

सोमस्य पीतिः अथवा सोम के रस/आनन्द की प्राप्ति के लिए—इस अर्थ में प्रयोग। महर्षि दयानन्द के भाष्य में उत्पन्न पदार्थों के रसपान और आनन्द की ओर भी संकेत मिलता है।


मन्त्र विनियोग

ऋषि: मधुच्छन्दा वैश्वामित्र
देवता: वायु
छन्द: गायत्री
स्वर: षड्ज

कर्मकाण्डीय विनियोग

सोमयाग में ऐन्द्रवायव ग्रह के अन्तर्गत वायु देवता को सोम अर्पण करते समय इस मन्त्र का पाठ किया जाता है।

सामान्य विनियोग

इस मन्त्र का प्रयोग वाणी की शुद्धता, विद्या-अध्ययन, प्राणायाम, ज्ञान-प्राप्ति तथा ईश्वरीय वेदवाणी के प्रति श्रद्धा और प्रार्थना के भाव से किया जा सकता है।


आज का वैदिक संदेश

वायु से वाणी, वाणी से ज्ञान और ज्ञान से जीवन में प्रकाश उत्पन्न होता है।

मनुष्य को अपनी वाणी को सत्य, मधुर और ज्ञानवर्धक बनाना चाहिए। जिस प्रकार वायु ध्वनि को आगे ले जाती है, उसी प्रकार हमारी वाणी हमारे विचारों और संस्कारों को समाज तक पहुँचाती है।

अतः वाणी का सदुपयोग करें, ज्ञान प्राप्त करें और ज्ञान का प्रसार करें।


दैनिक ऋग्वेद मन्त्र

मन्त्र पढ़ें।
अर्थ समझें।
मनन करें।
और वैदिक ज्ञान को जीवन में उतारें।

॥ ॐ ॥

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