ऋग्वेद मन्त्र इन्द्र और वायु का आह्वान

ऋग्वेद मन्त्र १.२.४

इन्द्र और वायु का आह्वान

मूल मन्त्र

इन्द्र॑वायू इ॒मे सु॒ता उप॒ प्रयो॑भि॒रा ग॑तं ।
इंद॑वो वामु॒शंति॒ हि ॥४॥

सरल भाव:
हे इन्द्र और वायु! ये सोमरस आपके लिए तैयार किए गए हैं। आप तृप्तिदायक अन्नों के साथ हमारे समीप पधारें, क्योंकि ये सोम-बिन्दु आप दोनों की ही कामना करते हैं।

१. पदपाठ

इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । इ॒मे । सु॒ताः । उप॑ । प्रयः॑ऽभिः । आ । ग॒त॒म् ।
इन्द॑वः । वा॒म् । उ॒शन्ति॑ । हि ॥४॥

२. शब्दार्थ

शब्दअर्थ
इन्द्रवायूहे इन्द्र और वायु! / सूर्य और पवन
इमेये
सुताःनिचोड़े/तैयार किए हुए सोमरस
उपसमीप
प्रयोभिःतृप्तिदायक अन्नों के साथ
आ गतम्आप दोनों आइए
इन्दवःसोम-बिन्दु / जल
वाम्आप दोनों के लिए
उशन्तिकामना करते हैं
हिक्योंकि

३. परम्परागत अर्थ — आचार्य सायण

सोमयाग के प्रसंग में यह मन्त्र ऐन्द्रवायव ग्रह से सम्बद्ध है। सायण भाष्य में इसके विशेष विनियोग का उल्लेख मिलता है।

भाव यह है:

“हे इन्द्र और वायु देव! आपके लिए सोमरस तैयार किया गया है। अतः तृप्तिदायक अन्नों के साथ हमारे समीप पधारिए। ये सोम-बिन्दु आप दोनों की ही कामना करते हैं।”

यहाँ मन्त्र का मुख्य संदर्भ सोमयज्ञ और इन्द्र-वायु देवताओं का आह्वान है।

४. वैज्ञानिक/भौतिक दृष्टि

महर्षि दयानन्द की व्याख्या-परम्परा में इन्द्र को सूर्य और वायु को प्रत्यक्ष पवन के रूप में समझने का आधार मिलता है।

इस दृष्टि से मन्त्र को प्रकृति के सूर्य–जल–वायु–वृष्टि–अन्न चक्र से जोड़ा जा सकता है।

भावार्थ:
सूर्य और वायु पृथ्वी पर जीवन और पदार्थों की उत्पत्ति एवं परिपक्वता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सूर्य जल का वाष्पीकरण करता है और वायु उस जलवाष्प को गतिशील करके बादलों तथा वर्षा की प्रक्रिया में सहायक होती है। वर्षा से अन्न और अन्य जीवनोपयोगी पदार्थ उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार “इन्दवः” को जल/सोम-बिन्दुओं के रूप में तथा “प्रयोभिः” को तृप्तिदायक अन्नादि के रूप में समझने पर मन्त्र को प्राकृतिक जलचक्र और अन्न-उत्पादन से जोड़ा जा सकता है।

महत्वपूर्ण: इस वैज्ञानिक व्याख्या को आधुनिक विज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाणित अनुवाद न कहकर वैदिक मन्त्र की एक दार्शनिक/प्राकृतिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा।

५. व्याकरणिक संकेत

  • इन्द्रवायू — द्विवचन सम्बोधन।
  • आ गतम् — गम् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन।
  • वाम् — युष्मद् शब्द का द्विवचन रूप।
  • इन्दवः — इन्दु शब्द का प्रथमा विभक्ति, बहुवचन।
  • उशन्ति — इच्छा/कामना के अर्थ में प्रयुक्त क्रियारूप।
  • मन्त्र में वैदिक स्वर-विधान और पद-सिद्धि के विशिष्ट नियम भी लागू होते हैं।

एक पंक्ति में मन्त्र का संदेश

परम्परागत दृष्टि से: सोमयज्ञ में इन्द्र और वायु का आह्वान।
प्राकृतिक दृष्टि से: सूर्य और वायु के माध्यम से जलचक्र, वर्षा और अन्न-उत्पादन की ओर संकेत।

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