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अथर्ववेद १/१/४

श्रुत ज्ञान से कभी वियुक्त न हों

📜 अथर्ववेद दैनिक मन्त्र

अथर्ववेद — काण्ड १, सूक्त १, मन्त्र ४

मूल मन्त्र

उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम् ।
सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि ॥४॥

सरल भावार्थ

वाणी के स्वामी वाचस्पति हमारे समीप आवाहित हों और हमें अपने समीप बुलाएँ। हम प्राप्त किए हुए श्रुत ज्ञान के साथ भली-भाँति संयुक्त हों और उस ज्ञान से कभी वियुक्त न हों।

यह मन्त्र विशेष रूप से विद्या, श्रवण, अध्ययन, मेधा, स्मरण और ज्ञान को स्थिर रखने की भावना को व्यक्त करता है।


पदपाठ

उपऽहूतः । वाचः । पतिः । उप । अस्मान् । वाचः । पतिः । ह्वयताम् ।
सम् । श्रुतेन । गमेमहि । मा । श्रुतेन । वि । राधिषि ॥४॥


पदार्थ — Word Meaning

पदअर्थ
उपहूतःसमीप बुलाए गए, आवाहित
वाचस्पतिःवाणी के स्वामी
उपसमीप
अस्मान्हमें
ह्वयताम्बुलाएँ, समीप आने की अनुमति दें
सं गमेमहिहम भली-भाँति संयुक्त हों, प्राप्त करें
श्रुतेनसुने हुए, अध्ययन किए हुए ज्ञान के साथ
मानहीं
वि राधिषिमैं वियुक्त होऊँ, अलग होऊँ

सायण भाष्य का भावार्थ

आचार्य सायण के अनुसार इस मन्त्र में साधक वाचस्पति से प्रार्थना करता है कि वे उसके समीप आएँ और उसे ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने समीप बुलाएँ।

वाचस्पति वाणी और ज्ञान के अधिष्ठाता हैं। साधक उनकी कृपा से प्राप्त मेधा के द्वारा वेद, शास्त्र और अन्य विद्याओं को अच्छी प्रकार ग्रहण करना चाहता है।

मन्त्र का अगला भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है—

“सं श्रुतेन गमेमहि”

अर्थात् हम श्रुत ज्ञान के साथ भली-भाँति संयुक्त हों। केवल ज्ञान को सुन लेना ही पर्याप्त नहीं है; उसे समझना, आत्मसात् करना और जीवन में धारण करना भी आवश्यक है।

इसके बाद साधक प्रार्थना करता है—

“मा श्रुतेन वि राधिषि”

अर्थात् मैं प्राप्त किए हुए श्रुत ज्ञान से कभी वियुक्त न होऊँ।

इस प्रकार मन्त्र का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्राप्त ज्ञान को स्थिर रखना और उससे निरन्तर जुड़े रहना है।


व्याकरण एवं पद-साधना

आचार्य सायण की परम्परा में वैदिक मन्त्रों के प्रत्येक पद की व्याकरणिक सिद्धि को अत्यंत महत्व दिया गया है।

१. उपहूतः

उप + ह्वेञ् + क्त

‘उप’ उपसर्गपूर्वक ह्वेञ् धातु से कर्मणि प्रयोग में ‘क्त’ प्रत्यय होता है।

पाणिनीय प्रक्रिया में—

“वचिस्वपि यजादीनां किति” (६.१.१५)

के द्वारा सम्प्रसारण की प्रक्रिया से ‘ह्व’ का रूप परिवर्तन होकर हूत रूप प्राप्त होता है।

अतः—

उप + हूत → उपहूतः

अर्थ — समीप बुलाया गया अथवा आवाहित।


२. सं गमेमहि

यहाँ सम् उपसर्गपूर्वक गम् (गतौ) धातु का प्रयोग हुआ है।

सम् + गम् → संगम्

वैदिक प्रयोग में यहाँ आशीर्लिङ् का विधान माना गया है।

पाणिनीय सूत्र—

“लिङयाशिष्यङ्” (३.१.८६)

तथा—

“लिङः सीयुट्” (३.४.१०२)

आदि सूत्रों से रूप-सिद्धि की प्रक्रिया समझी जाती है।

वैदिक प्रयोग में—

“छन्दस्युभयथा” (३.४.११७)

आदि नियमों के कारण लौकिक संस्कृत से भिन्न रूप प्राप्त हो सकता है।

इससे मन्त्र में “सं गमेमहि” रूप सिद्ध होता है।

अर्थ—

हम भली-भाँति संयुक्त हों / प्राप्त करें।


३. वि राधिषि

यहाँ वि उपसर्गपूर्वक—

राध् — साध संसिद्धौ

धातु का प्रयोग हुआ है।

वि + राध् → विराध्

‘मा’ के निषेध के साथ वैदिक प्रयोग में लुङ् आदि की विशेष प्रक्रिया दिखाई देती है। वेदों में “व्यत्ययो बहुलम्” (३.१.८५) के कारण पदरूपों में विशेष वैदिक प्रयोग भी प्राप्त होते हैं।

मा श्रुतेन वि राधिषि

का भाव है—

मैं श्रुत ज्ञान से वियुक्त न होऊँ।


आधुनिक ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में मन्त्र

यह मन्त्र प्राचीन वैदिक शिक्षा-पद्धति की उस भावना को सामने रखता है जिसमें श्रवण, ग्रहण, स्मरण और ज्ञान से निरन्तर जुड़े रहना शिक्षा के महत्वपूर्ण अंग हैं।

१. वाचस्पति और भाषा

आधुनिक न्यूरोसाइंस के अनुसार मस्तिष्क में भाषा के निर्माण और भाषा की समझ से जुड़े विशिष्ट तंत्रिका-क्षेत्र होते हैं। उदाहरण के लिए Broca’s area और Wernicke’s area भाषा-संबंधी महत्वपूर्ण कार्यों में योगदान देते हैं।

इस दृष्टि से “वाचस्पति” की प्रार्थना को आधुनिक संदर्भ में भाषा, अभिव्यक्ति और ज्ञान-ग्रहण की क्षमता को जागृत करने की प्रेरणा के रूप में समझा जा सकता है।

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यह एक आधुनिक व्याख्यात्मक तुलना है; वाचस्पति को सीधे किसी एक मस्तिष्क-क्षेत्र के समान मानना वैदिक मन्त्र का शाब्दिक अर्थ नहीं है।


२. “श्रुतेन” और श्रवण द्वारा सीखना

वैदिक परम्परा में ज्ञान के संरक्षण में श्रवण का विशेष महत्व था।

“सं श्रुतेन गमेमहि”

में साधक प्राप्त श्रुत ज्ञान के साथ संयुक्त होने की कामना करता है।

आधुनिक learning science में भी सूचना को सुनना, समझना, दोहराना, अभ्यास करना और पूर्वज्ञान से जोड़ना सीखने की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण माने जाते हैं।

इसलिए यह मन्त्र विद्यार्थी को एक महत्वपूर्ण मानसिक दिशा देता है—

सिर्फ सुनना नहीं, सुने हुए ज्ञान को आत्मसात् करना।


“मा श्रुतेन वि राधिषि” और स्मृति

मन्त्र का सबसे प्रेरक भाग है—

मा श्रुतेन वि राधिषि

“मैं श्रुत ज्ञान से वियुक्त न होऊँ।”

मानव स्मृति में समय के साथ भूलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। Hermann Ebbinghaus के प्रसिद्ध Forgetting Curve के अध्ययन ने यह दिखाया कि बिना पुनरावृत्ति के सीखी हुई जानकारी समय के साथ कम याद रह सकती है।

इस मन्त्र की भावना इसके विपरीत एक सकारात्मक संकल्प प्रस्तुत करती है—

जो ज्ञान प्राप्त किया है, उससे मेरा सम्बन्ध बना रहे।

आधुनिक अध्ययन-पद्धतियों में इसके लिए active recall, spaced repetition, अभ्यास और पुनरावृत्ति जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

इसलिए मन्त्र का नियमित उच्चारण विद्यार्थी के लिए एक ज्ञान-संकल्प के रूप में उपयोगी हो सकता है।


📚 दैनिक जीवन में मन्त्र का उपयोग

१. विद्यार्थियों के लिए

अध्ययन शुरू करने से पहले मन्त्र का उच्चारण करके विद्यार्थी यह संकल्प कर सकता है—

“जो मैं आज सुनूँ और पढ़ूँ, उसे समझूँ, आत्मसात् करूँ और स्मरण में रखूँ।”

इससे अध्ययन के समय मन को एक स्पष्ट उद्देश्य मिलता है।


२. कक्षा प्रारम्भ करने से पहले

विद्यालय, गुरुकुल, ऑनलाइन क्लास या अध्ययन-सत्र के प्रारम्भ में इस मन्त्र को मंगलाचरण के रूप में रखा जा सकता है।

विशेष रूप से शिक्षक और विद्यार्थी दोनों मिलकर इसका उच्चारण करें तो यह पूरे अध्ययन-सत्र के लिए एक सकारात्मक वातावरण बना सकता है।


३. वेद एवं शास्त्र अध्ययन

वेदाध्ययन की परम्परा में श्रवण और स्मरण का विशेष महत्व रहा है। इसलिए यह मन्त्र वेद-पाठ, संस्कृत-अध्ययन और शास्त्र-अध्ययन के प्रारम्भ में विशेष रूप से उपयुक्त है।


४. ज्ञान को जीवन से जोड़ना

मन्त्र हमें केवल अधिक जानकारी प्राप्त करने की प्रेरणा नहीं देता।

इसका संदेश है—

ज्ञान प्राप्त करो → उसे आत्मसात् करो → स्मरण रखो → उससे वियुक्त मत हो।

यही शिक्षा को केवल सूचना से उठाकर जीवनोपयोगी ज्ञान में बदलता है।


🌿 आज का वैदिक संदेश

“ज्ञान केवल सुनने के लिए नहीं, जीवन में धारण करने के लिए है।”

अथर्ववेद का यह मन्त्र हमें प्रार्थना के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण विद्यार्थी-संकल्प भी देता है—

मैं श्रेष्ठ ज्ञान को ग्रहण करूँ।
मैं उसे समझूँ।
मैं उसे स्मरण रखूँ।
और प्राप्त ज्ञान से कभी वियुक्त न होऊँ।

मन्त्र-स्मरण

उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम् ।
सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि ॥४॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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