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ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त ३५, मन्त्र १० : समग्र अध्ययन

Daily Ved | वैदिक मन्त्र-दर्शन एवं वैज्ञानिक स्वरूप

ऋग्वेद का प्रत्येक मन्त्र केवल उपासना की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रकृति, जीवन, नैतिकता और मानव-व्यवहार के अनेक पक्षों को समझने का अवसर देता है। ऋग्वेद मण्डल १ के सूक्त ३५ में मुख्य देवता सविता हैं। इस सूक्त के दशम मन्त्र में सविता के स्वर्णिम प्रकाश, जीवनदायक स्वरूप, उत्तम मार्गदर्शन, सुखप्रदता तथा बाधाओं को दूर करने वाले गुणों का वर्णन मिलता है।

इस मन्त्र के ऋषि हिरण्यस्तूप आङ्गिरस, देवता सविता तथा छन्द विराट् त्रिष्टुप् है। वैदिक पाठ में मन्त्र का पदपाठ भी उपलब्ध है।

१. मन्त्र

हिर॑ण्यहस्तो॒ असु॑रः सुनी॒थः सु॑मृळी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ् ।
अ॒प॒सेध॑न्र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द्दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः ॥१०॥

पदपाठ

हिरण्यऽहस्तः । असुरः । सु-नीथः । सु-मृळी॒कः । स्व-वाँ । यातु । अर्वाङ् ।
अप-सेधन् । रक्षसः । यातुधानान् । अस्थात् । देवः । प्रति-दोषम् । गृणानः ॥

पदपाठ के अनुसार मन्त्र के प्रमुख पदों का विभाजन हिरण्यहस्तः, असुरः, सुनीथः, सुमृळीकः, स्ववान्, यातु, अर्वाङ्, अपसेधन्, रक्षसः, यातुधानान्, अस्थात्, देवः, प्रतिदोषम्, गृणानः है।


२. मन्त्र का सामान्य भाव

यहाँ सविता को हिरण्यहस्तः अर्थात् स्वर्णिम प्रकाश वाले हाथों से युक्त, असुरः अर्थात् प्राणदाता/बलसम्पन्न, सुनीथः अर्थात् उत्तम मार्गदर्शक और सुमृळीकः अर्थात् सुख एवं अनुग्रह प्रदान करने वाला कहा गया है।

मन्त्र की प्रार्थना है कि ऐसा कल्याणकारी देव हमारे समीप आए और बाधक तथा हिंसक शक्तियों को दूर करते हुए अपनी व्यवस्था और प्रकाशमयी शक्ति से जीवन को सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित करे।

सायणाचार्य के भाष्य में सविता को प्राणदाता, उत्तम नेता, सुखदाता और धनवान् बताया गया है तथा प्रतिदोषम् को प्रतिरात्रि/सायंकाल के अर्थ में लिया गया है।


३. पद-अर्थ

हिरण्यहस्तः

हिरण्य + हस्तः

  • हिरण्य = स्वर्ण, स्वर्णिम तेज, प्रकाश
  • हस्त = हाथ
  • हिरण्यहस्तः = स्वर्णिम हाथों वाला

सायणाचार्य इसे स्वर्णिम किरणों के समान हाथों वाला मानते हैं। वैदिक काव्य में सूर्य की किरणों को हाथों के रूप में देखना एक अत्यन्त सुन्दर रूपक है।

भाव: जिसकी किरणें हाथों के समान चारों ओर फैलती हैं।

असुरः

यहाँ असुर शब्द को आधुनिक हिन्दी में प्रचलित “दानव” के अर्थ में लेना उचित नहीं है।

सायणाचार्य के अनुसार यहाँ असुरः = प्राणदाता है।

भाव: जीवन को शक्ति और प्राण देने वाला।

सुनीथः

सु + नीथ

  • सु = अच्छा, उत्तम
  • नीथ = मार्गदर्शन/नेतृत्व से सम्बन्धित अर्थ
  • सुनीथः = उत्तम मार्गदर्शक

सायणाचार्य इसे सुष्ठु नेता अर्थात् उत्तम मार्गदर्शक बताते हैं।

सुमृळीकः

सु + मृळीक

  • सु = उत्तम
  • मृळीक = अनुग्रह, कृपा, सुख
  • सुमृळीकः = उत्तम सुख एवं अनुग्रह देने वाला

सायणाचार्य के अनुसार यह सुष्ठु सुखयिता अर्थात् अच्छी प्रकार सुख देने वाला है।

स्ववान्

इस पद की व्याख्या में वैदिक परम्परा में अर्थभेद दिखाई देता है।

सायणाचार्य इसे धनवान्/सम्पन्न के अर्थ में लेते हैं। दूसरी व्याख्या में इसे अपने गुणों/सहायक शक्ति से युक्त माना गया है। उपलब्ध वैदिक व्याकरणिक विश्लेषण भी इस पद के पाठ और व्युत्पत्ति में मतभेद की सूचना देता है।

यातु

√या — लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन

यातु = आए / जाए / हमारे समीप आए।

व्याकरणिक विश्लेषण में इसे √या धातु का वर्तमानकालीन आज्ञार्थक रूप माना गया है।

अर्वाङ्

अर्वाञ्च् → अर्वाङ्

अर्थ — हमारी ओर, अभिमुख, समीप की ओर आने वाला।

व्याकरणिक स्रोत इसे अर्वाञ्च् शब्द का प्रथमा एकवचन पुल्लिंग रूप बताते हैं।

अपसेधन्

अप + √सिध्

अर्थ — दूर हटाते हुए, निवारण करते हुए, भगाते हुए।

यह वर्तमानकालीन क्रियात्मक रूप है और मन्त्र में रक्षसों तथा यातुधानों को दूर करने की क्रिया से सम्बन्धित है।

रक्षसः

रक्षस् → रक्षसः

यहाँ अर्थ — बाधक, हानिकारक या दुष्ट शक्तियाँ।

सायणाचार्य इसे बाधक तत्वों के रूप में लेते हैं और यास्कीय व्याख्या से भी इसका सम्बन्ध बताते हैं।

यातुधानान्

यातुधान → यातुधानान्

यह द्वितीया बहुवचन है।

परम्परागत अर्थ में यातुधान दुष्ट, हिंसक अथवा हानिकारक शक्तियों के लिए प्रयुक्त हुआ है। व्याकरणिक स्रोत इसे masculine accusative plural के रूप में देता है।

अस्थात्

√स्था — लुङ्/आओरिस्ट, प्रथम पुरुष, एकवचन

अर्थ — स्थित हुआ, खड़ा हुआ, विद्यमान हुआ।

व्याकरणिक विश्लेषण में इसे √स्था का root aorist, प्रथम पुरुष एकवचन माना गया है।

देवः

√दिव्/द्युत् से सम्बन्धित देव शब्द

अर्थ — प्रकाशमान, द्योतमान, देव।

यहाँ देवः सविता के लिए प्रयुक्त है।

प्रतिदोषम्

प्रति + दोष

अर्थ — प्रत्येक सायंकाल, प्रत्येक रात्रि अथवा सायंकाल की ओर।

सायणाचार्य इसे प्रतिरात्रि के अर्थ में लेते हैं। आधुनिक वैदिक व्याख्या में इसे “towards evening/every evening” दोनों प्रकार से समझा गया है।

गृणानः

√गॄ — वर्तमान कृदन्त

अर्थ — स्तुति किया जाता हुआ, स्तुति योग्य।

सायणाचार्य इसे स्तूयमान अर्थात् स्तुति किया जाता हुआ बताते हैं। व्याकरणिक विश्लेषण में यह √गॄ से वर्तमान कृदन्त रूप माना गया है।


४. सायणाचार्य के अनुसार अर्थ

सायणाचार्य के अनुसार मन्त्र में सविता को प्राणदाता, उत्तम नेता, सुखदाता और सम्पन्न कहा गया है।

भावार्थ

“स्वर्णिम हाथों वाले, प्राणदाता, उत्तम मार्गदर्शक, सुख प्रदान करने वाले और ऐश्वर्यसम्पन्न सविता हमारे समीप आएँ। वे बाधक रक्षसों और यातुधानों को दूर करते हुए, प्रत्येक रात्रि/सायंकाल स्तुति किए जाते हुए स्थित होते हैं।”

सायण-भाष्य में हिरण्यहस्तः आदि विशेषणों को सविता के गुणों के रूप में लिया गया है और अपसेधन् का अर्थ बाधक शक्तियों को दूर करने वाला किया गया है।


५. महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार अर्थ

महर्षि दयानन्द सरस्वती की व्याख्या इस मन्त्र को एक व्यापक प्राकृतिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से भी देखती है। उपलब्ध भाष्य में उन्होंने इस मन्त्र के प्रसंग में वायु के गुणों का भी उपदेश माना है। उनके अनुसार हिरण्यहस्त, असुर, सुनीथ, सुमृळीक, स्ववान् आदि विशेषण वायु के गुणों के रूपक के रूप में भी समझे जा सकते हैं।

भावार्थ

“हे सभापति! जैसे प्राणों की रक्षा करने वाला, उत्तम मार्ग से ले जाने वाला, सुख देने वाला और श्रेष्ठ गुणों से युक्त वायु चारों ओर गति करता है तथा दुःखों को दूर करता है, वैसे ही आप भी दुष्ट कर्म करने वालों और पीड़ा पहुँचाने वालों को दूर करते हुए श्रेष्ठ कार्यों को प्राप्त हों।”

महर्षि दयानन्द के भाष्य में इस मन्त्र का उपदेश केवल प्राकृतिक शक्ति का वर्णन न रहकर मनुष्य के आचरण और नेतृत्व के लिए आदर्श बन जाता है।


६. दोनों व्याख्याओं में महत्वपूर्ण अन्तर

इस मन्त्र का अध्ययन करते समय एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

सायणाचार्य की प्रमुख दिशा

सविता → प्राणदाता → मार्गदर्शक → सुखदाता → बाधाओं का निवारण

महर्षि दयानन्द की प्रमुख दिशा

प्राकृतिक शक्ति/वायु → गति → व्यवस्था → सुख → दुष्टों का निवारण → मानव के लिए आदर्श

इसलिए मन्त्र को केवल “सूर्य की पूजा” के रूप में सीमित करना इसके वैदिक अर्थ-क्षेत्र को छोटा कर देता है। दूसरी ओर, आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों को मन्त्र में सीधे-सीधे सिद्ध वैज्ञानिक सूत्र मान लेना भी उचित नहीं है।

अधिक संतुलित दृष्टि यह है कि मन्त्र प्रकृति के प्रकाश, गति, जीवनोपयोगिता और बाधा-निवारणकारी प्रभाव को काव्यात्मक एवं दार्शनिक भाषा में प्रस्तुत करता है।


७. वैज्ञानिक दृष्टिकोण

७.१ हिरण्यहस्तः और सौर विकिरण

“हिरण्यहस्तः” की कल्पना को सूर्य की प्रकाशमयी किरणों के रूपक के रूप में समझा जा सकता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी को मिलने वाली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य है। सूर्य का विकिरण पृथ्वी के तापमान, वायुमण्डलीय परिसंचरण, जलचक्र और वनस्पतियों की उत्पादकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। NASA भी सूर्य को पृथ्वी के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बताता है।

इस दृष्टि से “स्वर्णिम हाथ” एक सुन्दर वैदिक काव्य-चित्र है—सूर्य की किरणें मानो अपने हाथों से पृथ्वी को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान कर रही हों।

७.२ असुरः — जीवनदायक शक्ति

मन्त्र में “असुर” शब्द को “प्राणदाता” के अर्थ में समझना महत्वपूर्ण है।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन की आधारभूत ऊर्जा-व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाती है। पौधे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं और यही ऊर्जा खाद्य-श्रृंखला के माध्यम से अन्य जीवों तक पहुँचती है।

इसलिए “प्राणदाता” का वैदिक भाव आधुनिक विज्ञान में सूर्य की जीवन-समर्थक ऊर्जा से एक सार्थक साम्य रखता है।

७.३ अपसेधन् रक्षसः — रोग एवं हानिकारक तत्व

मन्त्र में सविता को बाधक शक्तियों को दूर करने वाला कहा गया है।

इसे आधुनिक विज्ञान से जोड़ते समय सावधानी आवश्यक है। सूर्य का प्रकाश और विशेषकर UV विकिरण कुछ सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय कर सकता है। नियंत्रित UV तकनीक का उपयोग जल, वायु और सतहों के disinfection में किया जाता है। CDC के अनुसार UV radiation सूक्ष्मजीवों के nucleic acids को क्षतिग्रस्त करके उन्हें निष्क्रिय कर सकती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सूर्य का प्रकाश हर प्रकार के रोगाणु को स्वतः समाप्त कर देता है। UV का प्रभाव wavelength, intensity, exposure time और microorganism जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करता है। साथ ही अत्यधिक UV मानव त्वचा और आँखों के लिए हानिकारक भी हो सकता है।

अतः मन्त्र के “रक्षसः” और “यातुधानान्” को आधुनिक रोगाणुओं के साथ शाब्दिक वैज्ञानिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि एक संभावित वैचारिक साम्य के रूप में देखना अधिक उचित है।

७.४ प्रतिदोषम् — दैनिक प्राकृतिक चक्र

मन्त्र में प्रतिदोषम् का सम्बन्ध सायंकाल/रात्रि से किया गया है।

आधुनिक दृष्टि से दिन और रात पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न होते हैं। सूर्य के प्रकाश का नियमित आवागमन मानव जीवन, वनस्पति, तापमान और जैविक लय पर गहरा प्रभाव डालता है।

NASA के अनुसार सूर्य पृथ्वी के climate system और जलचक्र सहित अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाओं को चलाने वाली प्रमुख ऊर्जा प्रदान करता है।

इस प्रकार मन्त्र का “प्रतिदोषम्” हमें प्रकृति के नियमित, पुनरावर्ती और समयबद्ध चक्र की ओर ध्यान दिलाता है।


८. दैनिक जीवन में मन्त्र की उपयोगिता

इस मन्त्र को केवल धार्मिक पाठ के रूप में न लेकर जीवन के लिए व्यवहारिक प्रेरणा के रूप में भी अपनाया जा सकता है।

१. प्रतिदिन सूर्य के प्रकाश का सम्मान करें

प्रातःकाल प्राकृतिक प्रकाश में कुछ समय बिताना दिनचर्या को व्यवस्थित करने की दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। हालांकि अत्यधिक UV exposure से बचना भी आवश्यक है।

२. अपने जीवन में “हिरण्यहस्त” बनें

जिस प्रकार सूर्य की किरणें बिना भेदभाव के प्रकाश देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने ज्ञान, समय और सामर्थ्य का उपयोग दूसरों के कल्याण में करना चाहिए।

३. “सुनीथः” — उत्तम मार्गदर्शक बनें

केवल स्वयं सफल होना पर्याप्त नहीं। जो व्यक्ति दूसरों को सही दिशा दिखाता है, वह सुनीथ के भाव को अपने जीवन में उतारता है।

ज्ञान + सही दिशा + सदाचार = श्रेष्ठ नेतृत्व।

४. “सुमृळीकः” — दूसरों को सुख दें

परिवार, समाज और कार्यस्थल में ऐसा व्यवहार करें जिससे अनावश्यक तनाव न बढ़े।

मधुर वाणी, सहयोग और क्षमा—ये दैनिक जीवन में “सुमृळीक” भाव के व्यावहारिक रूप हो सकते हैं।

५. “अपसेधन्” — नकारात्मकता को दूर करें

रक्षस और यातुधान को केवल बाहरी शत्रु मानने के स्थान पर जीवन में उपस्थित हानिकारक प्रवृत्तियों का भी प्रतीक माना जा सकता है—

  • आलस्य
  • असत्य
  • क्रोध
  • हिंसा
  • नशा
  • ईर्ष्या
  • अनियमित दिनचर्या
  • नकारात्मक संगति

इनको पहचानकर धीरे-धीरे दूर करना इस मन्त्र की व्यावहारिक साधना हो सकती है।

६. सूर्य और प्रकृति के नियमों से सीखें

सूर्य नियमितता का महान उदाहरण है। इसलिए विद्यार्थी, शिक्षक, कर्मचारी और गृहस्थ सभी अपने जीवन में नियमित समय, नियमित अध्ययन, नियमित श्रम और नियमित विश्राम को अपनाएँ।

७. संध्या समय आत्मपरीक्षण

“प्रतिदोषम्” को सायंकाल से जोड़कर एक सुंदर दैनिक अभ्यास बनाया जा सकता है।

संध्या के समय स्वयं से तीन प्रश्न पूछें:

आज मैंने क्या अच्छा किया?
आज मुझसे क्या गलती हुई?
कल मैं क्या सुधारूँगा?

इस प्रकार वैदिक मन्त्र जीवन में आत्म-सुधार की प्रेरणा बन सकता है।


९. मन्त्र से मिलने वाली मुख्य जीवन-शिक्षाएँ

हिरण्यहस्तः — प्रकाश दो।
असुरः — जीवन को शक्ति दो।
सुनीथः — सही मार्ग दिखाओ।
सुमृळीकः — दूसरों को सुख दो।
स्ववान् — अच्छे गुणों से सम्पन्न बनो।
अपसेधन् — बुराइयों को दूर करो।
प्रतिदोषम् — नियमित रहो।
गृणानः — अच्छे गुणों को पहचानो और उनका सम्मान करो।


१०. समग्र निष्कर्ष

ऋग्वेद १.३५.१० में सविता का चित्रण प्रकाश, जीवन, मार्गदर्शन, सुख और बाधा-निवारण से जुड़े अनेक गुणों के माध्यम से किया गया है।

सायणाचार्य की व्याख्या में यह मन्त्र सविता के प्राणदाता और कल्याणकारी देवस्वरूप को सामने लाता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती की व्याख्या में यही मन्त्र प्राकृतिक शक्तियों के गुणों से प्रेरणा लेकर मानव-व्यवहार, नेतृत्व और सामाजिक व्यवस्था के लिए भी शिक्षा देता है।

आधुनिक विज्ञान के साथ इसका अध्ययन करने पर सूर्य की ऊर्जा, प्रकाश, जैविक जीवन, जलचक्र और UV विकिरण जैसे विषयों के साथ वैचारिक साम्य दिखाई देता है। NASA के अनुसार सूर्य पृथ्वी की ऊर्जा-व्यवस्था और जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जबकि वैज्ञानिक रूप से UV radiation के कुछ नियंत्रित उपयोग सूक्ष्मजीवों के निष्क्रियकरण में किए जाते हैं।

फिर भी वैज्ञानिक दृष्टि से यह भेद बनाए रखना आवश्यक है कि वैदिक मन्त्र का काव्यात्मक/दार्शनिक अर्थ और आधुनिक प्रयोगात्मक विज्ञान एक ही प्रकार के प्रमाण नहीं हैं। मन्त्र से आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों की प्रेरणा या साम्य पर चर्चा की जा सकती है, लेकिन किसी आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य को मन्त्र में शाब्दिक रूप से “पहले से सिद्ध” बताने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक होंगे।

इस मन्त्र का सबसे व्यावहारिक संदेश यही है—

प्रकाशवान बनें, जीवनदायक बनें, सही मार्ग दिखाएँ, सुख दें, नियमित रहें और अपने जीवन की हानिकारक प्रवृत्तियों को दूर करते रहें।

यही वैदिक ज्ञान को केवल पढ़ने के बजाय जीवन में उतारने का मार्ग है।


संदर्भ

  1. ऋग्वेदसंहिता, मण्डल १, सूक्त ३५, मन्त्र १०।
  2. सायणाचार्य भाष्य।
  3. महर्षि दयानन्द सरस्वती भाष्य।
  4. वैदिक पाठ एवं पदपाठ — ऋग्वेद १.३५.१०।
  5. आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भ — NASA एवं CDC के सौर विकिरण तथा UV radiation संबंधी स्रोत।

ऋषि विश्वामित्र विद्या फाउंडेशन
वेद — संस्कृत — वैदिक संस्कृति — वैज्ञानिक दृष्टिकोण

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