निरन्तर वर्धमान ऐश्वर्य, पोषण और यश की प्राप्ति
मूल मन्त्र
अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त्पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे ।
य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमं ॥३॥
पदपाठ
अ॒ग्निना॑ । र॒यिम् । अ॒श्न॒व॒त् । पोष॑म् । ए॒व । दि॒वेऽदि॑वे । य॒शस॑म् । वी॒रव॑त्ऽतमम् ॥३॥
शब्दार्थ
- अग्निना: अग्नि के द्वारा — उपास्य परमेश्वर, भौतिक ऊर्जा/अग्नि या यज्ञीय अग्नि के निमित्त से।
- रयिम्: धन और ऐश्वर्य को — विद्या, सुवर्ण आदि।
- अश्नवत्: प्राप्त करता है।
- पोषम्: पुष्ट होने वाले, निरन्तर बढ़ने वाले धन को।
- एव: ही, निश्चयपूर्वक।
- दिवेदिवे: प्रतिदिन, हर रोज।
- यशसम्: दान आदि उत्तम कर्मों से प्राप्त होने वाले यश से युक्त।
- वीरवत्तमम्: अतिशय वीर पुरुषों से युक्त — श्रेष्ठ विद्वान, शूरवीर सन्तान और रक्षक।
मन्त्र का अनुवाद और वैदिक दृष्टिकोण
आचार्य सायण का भाष्य — पारम्परिक एवं यज्ञीय अर्थ
जो स्तुति के योग्य अग्निदेव हैं, उनके निमित्त से यजमान ऐसे धन (रयिम्) को प्राप्त करता है, जो प्रतिदिन बढ़ता ही रहता है (पुष्यमाण) और कभी क्षीण नहीं होता।
यह धन केवल लौकिक सम्पत्ति नहीं है, बल्कि दान आदि सत्कार्यों के कारण यश प्रदान करने वाला है। साथ ही, यह धन श्रेष्ठ वीर पुत्रों तथा भृत्यों (सहायकों) से युक्त होता है, क्योंकि धन के होने पर ही उत्तम पुरुष और सहायक प्राप्त होते हैं।
कर्मकाण्ड के अनुसार अभिप्लव षडह के मध्यवर्ती उक्थों में तृतीय सवन के समय मैत्रावरुण द्वारा यह मन्त्र पढ़ा जाता है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती का भाष्य — आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आध्यात्मिक अर्थ:
मनुष्य सर्वव्यापक परमेश्वर (अग्नि) की उपासना से विद्या आदि उत्तम धन (रयिम्) को प्राप्त करता है। यह धन आत्मा और शरीर की पुष्टि कर सुख देने वाला, प्रतिदिन बढ़ने वाला, सर्वोत्तम कीर्ति बढ़ाने वाला तथा श्रेष्ठ विद्वानों और शूरवीरों से युक्त होता है।
वैज्ञानिक अर्थ:
जो मनुष्य भौतिक अग्नि अर्थात् ऊर्जा और ऊष्मा का उचित संयोजनों तथा यन्त्रों के साथ उपयोग करता है, वह प्रतिदिन अपार भौतिक सम्पदा, स्वर्ण आदि प्राप्त कर सकता है।
इस विज्ञान और Technology के सदुपयोग से राष्ट्र शक्तिशाली वीरों — शूरवीर सैनिकों और वैज्ञानिकों — से युक्त होता है तथा विश्व में यश प्राप्त करता है।
ऋग्वेद मन्त्र १.१.३ का भावार्थ
सच्ची सम्पत्ति केवल वह नहीं है जो तिजोरी में बंद रहे और समय के साथ घट जाए। वेद के अनुसार श्रेष्ठ धन वह है जो निरन्तर बढ़े, व्यक्ति और समाज का पोषण करे तथा अच्छे कर्मों के माध्यम से यश और सामर्थ्य उत्पन्न करे।
इस मन्त्र में धन के चार महत्वपूर्ण गुण दिखाई देते हैं:
- प्रतिदिन वृद्धि — Growth
ऐसा धन और ज्ञान जो निरन्तर बढ़ता रहे। - पोषण — Nourishment
जो शरीर, परिवार और समाज के विकास में सहायक हो। - यश — Fame
जिसका उपयोग सत्कर्म, दान और लोकहित में होने से सम्मान एवं कीर्ति प्राप्त हो। - वीरता एवं विद्या — Human Resource
जो समाज में विद्वान, वैज्ञानिक, रक्षक और शूरवीर मनुष्यों के निर्माण में सहायक बने।
इस प्रकार यह मन्त्र केवल धन प्राप्त करने की कामना नहीं करता, बल्कि ऐसी समृद्धि की बात करता है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र — सभी के विकास का कारण बने।
व्याकरण एवं निरुक्त
यह मन्त्र वैदिक संस्कृत व्याकरण के कई सुन्दर नियमों को दर्शाता है।
रयिम्
निघण्टु (२.१०.८) में ‘मघम्’ इत्यादि धन के नामों में ‘रयि’ शब्द का पाठ है।
रयि = धन।
अश्नवत्
यह ‘अश्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ प्राप्त करना/व्याप्त होना है।
वेद में लेट् लकार (Subjunctive mood) का प्रयोग होता है। पाणिनी सूत्र ‘लेटोऽडाटौ’ (३.४.९४) से अडागम हुआ है और ‘इतश्च लोपः’ (३.४.९७) से ‘तिप्’ प्रत्यय के इकार (इ) का लोप होकर अश्नवत् पद सिद्ध होता है। व्यत्यय से यहाँ परस्मैपद का प्रयोग है।
पोषम्
‘पुष्’ धातु से घञ् प्रत्यय लगकर यह शब्द बना है, जिसका अर्थ है पुष्ट करने वाला या स्वयं बढ़ने वाला।
दिवेदिवे
‘दिव्’ अर्थात् दिन शब्द से सप्तमी विभक्ति का रूप है।
‘नित्यवीप्सयोः’ (८.१.४) सूत्र से निरन्तरता/प्रतिदिन के अर्थ में इस शब्द की द्विरुक्ति हुई है।
अर्थात् दिवेदिवे = प्रतिदिन, प्रत्येक दिन।
यशसम्
‘यशोऽस्यास्तीति यशसम्’ — जिसके पास यश है।
यहाँ ‘अर्शआदिभ्योऽच्’ (५.२.१२७) सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय हुआ है।
वीरवत्तमम्
‘वीर’ शब्द से मतुप् (वत्) प्रत्यय लगा है, जिसका अर्थ है — वीरों वाला।
इसके बाद अतिशयता (Superlative degree) दर्शाने के लिए तमप् प्रत्यय का प्रयोग हुआ है, जिससे वीरवत्तमम् पद सिद्ध होता है।
दैनिक जीवन में ऋग्वेद मन्त्र १.१.३ का उपयोग
इस मन्त्र का संदेश आज के दैनिक जीवन में भी अत्यन्त उपयोगी है। इसे केवल धन प्राप्त करने की प्रार्थना के रूप में न देखकर समग्र जीवन-विकास का सिद्धान्त माना जा सकता है।
१. अपनी सम्पत्ति को प्रतिदिन बढ़ाएँ
हर महीने अपनी आय का कुछ भाग बचत और निवेश में लगाना, अनावश्यक खर्च कम करना और आर्थिक अनुशासन रखना — यह ‘दिवेदिवे पोषम्’, अर्थात् निरन्तर वृद्धि की भावना से जुड़ता है।
२. धन के साथ ज्ञान भी बढ़ाएँ
केवल पैसा जमा करना पर्याप्त नहीं है। प्रतिदिन कुछ नया सीखना, वेद-अध्ययन, विज्ञान, तकनीक, कौशल या किसी उपयोगी विषय का ज्ञान बढ़ाना वास्तविक ‘रयि’ अर्थात् सम्पत्ति को बढ़ाना है।
३. अपनी कमाई का उपयोग परिवार और समाज के पोषण में करें
ऐसी सम्पत्ति जिसका उपयोग परिवार, शिक्षा, जरूरतमंदों की सहायता और समाज के कल्याण में हो, वही वास्तव में पोषण करने वाली सम्पत्ति बनती है।
४. यश अच्छे कर्मों से प्राप्त करें
सम्मान केवल धन से नहीं मिलता। ईमानदारी, सेवा, दान, सत्य, परिश्रम और दूसरों के हित में किए गए कार्य व्यक्ति को स्थायी यश प्रदान करते हैं।
५. शरीर और मन को भी मजबूत बनाएँ
नियमित व्यायाम, उचित आहार, संयम, अध्ययन और सकारात्मक विचार व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति बढ़ाते हैं। स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति ही परिवार तथा समाज के लिए उपयोगी बन सकता है।
६. अपने परिवार में विद्या और वीरता का विकास करें
बच्चों को केवल आर्थिक रूप से सक्षम बनाना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें शिक्षा, चरित्र, अनुशासन, साहस और जिम्मेदारी देना भी आवश्यक है। यही मन्त्र के ‘वीरवत्तमम्’ भाव को दैनिक जीवन में उतारना है।
७. ऊर्जा और विज्ञान का सदुपयोग करें
आज अग्नि का व्यापक रूप ऊर्जा, बिजली, ईंधन और आधुनिक Technology में दिखाई देता है। ऊर्जा का सदुपयोग कृषि, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा और राष्ट्र-विकास में किया जा सकता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद मन्त्र १.१.३ हमें ऐसी समृद्धि की ओर प्रेरित करता है जो केवल धन-संग्रह तक सीमित न हो।
वास्तविक समृद्धि वह है जो:
धन बढ़ाए → ज्ञान बढ़ाए → शरीर और समाज का पोषण करे → सत्कर्मों से यश दे → विद्वान और वीर मनुष्य तैयार करे।
अर्थात् व्यक्ति की उन्नति से परिवार की उन्नति, परिवार की उन्नति से समाज की उन्नति और समाज की उन्नति से राष्ट्र की समृद्धि।
ॐ

