1. प्रस्तावना

पिछले पाठ में हमने जाना कि स्थान और करण के साथ वर्ण के उच्चारण में प्रयत्न का भी विशेष महत्व है।

प्रयत्न मुख्यतः दो प्रकार का माना जाता है:

  1. आभ्यन्तर प्रयत्न
  2. बाह्य प्रयत्न

इन दोनों के ज्ञान से विद्यार्थी यह समझ सकता है कि किसी वर्ण के उच्चारण के समय मुख के भीतर और वायु-ध्वनि की प्रक्रिया में क्या अंतर होता है।


2. आभ्यन्तर प्रयत्न

वर्ण के उच्चारण के समय मुख के भीतर उच्चारण-अंगों की स्थिति और उनके परस्पर सम्बन्ध को आभ्यन्तर प्रयत्न के अन्तर्गत समझा जाता है।

इसके प्रमुख भेद हैं:

  • स्पृष्ट
  • ईषत्स्पृष्ट
  • ईषद्विवृत
  • विवृत
  • संवृत

3. स्पृष्ट प्रयत्न

जब उच्चारण के समय उच्चारण-अंगों का परस्पर स्पर्श होता है, तो उसे स्पृष्ट प्रयत्न कहा जाता है।

वर्गीय व्यञ्जनों में स्पर्श की विशेष भूमिका दिखाई देती है।

उदाहरण:

क, च, ट, त, प

इनका अभ्यास करते समय विद्यार्थी मुख के भीतर होने वाली स्पर्श-क्रिया को समझने का प्रयास करें।


4. ईषत्स्पृष्ट

ईषत्स्पृष्ट का अर्थ है—हल्का या थोड़ा-सा स्पर्श।

यह पूर्ण स्पर्श से कम होता है।

अन्तःस्थ वर्णों के अध्ययन में इस प्रकार के प्रयत्न का विचार किया जाता है।

उदाहरण:

य, र, ल, व


5. ईषद्विवृत

जहाँ उच्चारण-अंगों के बीच थोड़ा-सा खुलाव रहता है, वहाँ ईषद्विवृत प्रयत्न की चर्चा की जाती है।

यह पूर्ण विवृत अवस्था से कम खुला हुआ होता है।


6. विवृत

जब उच्चारण के समय मुख का मार्ग पर्याप्त रूप से खुला रहता है, तो उसे विवृत कहा जाता है।

स्वरों के उच्चारण में मुख के खुलेपन का विशेष महत्व है।

उदाहरण:

अ, आ

विद्यार्थी “अ” और “आ” का स्पष्ट उच्चारण करके मुख के खुलने की स्थिति को अनुभव कर सकते हैं।


7. संवृत

जब मुख का मार्ग अपेक्षाकृत संकुचित या बन्द स्थिति में होता है, तो उसे संवृत कहा जाता है।

स्वरों और अन्य ध्वनियों के सूक्ष्म वर्गीकरण को समझने में इस भेद का उपयोग होता है।


8. बाह्य प्रयत्न

वर्ण के उच्चारण में वायु और ध्वनि की बाहरी विशेषताओं से सम्बन्धित प्रयत्न को बाह्य प्रयत्न के अन्तर्गत समझा जाता है।

इसके अन्तर्गत प्रमुख रूप से निम्न भेदों का अध्ययन किया जाता है:

  • घोष
  • अघोष
  • अल्पप्राण
  • महाप्राण
  • श्वास

इन भेदों को समझना संस्कृत व्यञ्जनों के शुद्ध उच्चारण के लिए अत्यंत उपयोगी है।


9. घोष और अघोष

घोष में स्वरयन्त्रों के कम्पन से सम्बन्धित ध्वनि-गुण पाया जाता है।

उदाहरण:

ग, घ, ज, झ, ड, ढ, द, ध, ब, भ

अघोष वर्णों में घोष का अभाव होता है।

उदाहरण:

क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ

विद्यार्थी अपने गले पर हल्का हाथ रखकर कुछ वर्णों का उच्चारण करें और कम्पन में अंतर अनुभव करें।


10. अल्पप्राण और महाप्राण

अल्पप्राण में वायु का अपेक्षाकृत कम प्रबल निष्क्रमण होता है।

उदाहरण:

क, ग, च, ज, ट, ड, त, द, प, ब

महाप्राण में वायु का अधिक स्पष्ट और प्रबल निष्क्रमण होता है।

उदाहरण:

ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ

विशेष रूप से इन युग्मों का अभ्यास करें:

क — ख
ग — घ
च — छ
ज — झ
ट — ठ
ड — ढ
त — थ
द — ध
प — फ
ब — भ


11. उच्चारण का व्यावहारिक अभ्यास

एक कागज का छोटा टुकड़ा या हथेली मुँह के सामने रखें।

अब उच्चारण करें:

क — ख

फिर:

ग — घ

फिर:

प — फ

महाप्राण वर्णों के उच्चारण में वायु का निष्क्रमण अधिक स्पष्ट अनुभव होगा।

यह केवल अभ्यास की सरल विधि है; शास्त्रीय उच्चारण का पूर्ण निर्धारण केवल वायु की मात्रा से नहीं होता।


12. सारांश

वर्णोच्चारण में:

आभ्यन्तर प्रयत्न → मुख के भीतर की स्थिति और क्रिया

बाह्य प्रयत्न → घोष, अघोष, प्राण आदि ध्वनि-वायु सम्बन्धी गुण

इन दोनों को समझकर विद्यार्थी संस्कृत वर्णों के सूक्ष्म उच्चारण-भेदों को बेहतर ढंग से पहचान सकता है।


13. अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1: प्रयत्न के दो मुख्य प्रकार कौन से हैं?

प्रश्न 2: आभ्यन्तर प्रयत्न के पाँच भेद लिखिए।

प्रश्न 3: घोष और अघोष में क्या अंतर है?

प्रश्न 4: अल्पप्राण और महाप्राण में क्या अंतर है?

प्रश्न 5: निम्न युग्मों में महाप्राण वर्ण पहचानिए:

क–ख, ग–घ, त–थ, द–ध, प–फ

अभ्यास कार्य

निम्न सभी युग्मों का स्पष्ट उच्चारण करें:

क–ख | ग–घ | च–छ | ज–झ | ट–ठ | ड–ढ | त–थ | द–ध | प–फ | ब–भ

प्रत्येक युग्म में अल्पप्राण और महाप्राण का अंतर अनुभव करने का प्रयास करें।