🌙 चन्द्रमा, ओषधियाँ और मूत्र-प्रवाह का वैदिक मन्त्र
अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त का चतुर्थ मन्त्र (१.३.४) शरीर में होने वाले निषेचन अर्थात् द्रव के बहिर्गमन और स्वास्थ्य की कामना से सम्बन्धित है। पिछले मन्त्र में वरुण का स्मरण किया गया था, जबकि इस मन्त्र में चन्द्रमा को शरस्य पितरम् अर्थात् ‘शर का पिता’ कहा गया है।
वैदिक परम्परा में चन्द्रमा का सम्बन्ध ओषधियों, रस और पोषण से भी जोड़ा गया है। इसी व्यापक वैदिक दृष्टिकोण में इस मन्त्र को समझना उपयोगी है।
📜 मूल मन्त्र
संहितापाठ
विद्मा शरस्य पितरं चन्द्रं शतवृष्ण्यम् ।
तेना ते तन्वे शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति ॥४॥
पदपाठ
विद्म । शरस्य । पितरम् । चन्द्रम् । शतऽवृष्ण्यम् ।
तेन । ते । तन्वे । शम् । करम् । पृथिव्याम् । ते ।
निऽसेचनम् । बहिः । ते । अस्तु । बाल् । इति ॥४॥
🔱 मन्त्र का परिचय
- वेद: अथर्ववेद
- काण्ड: प्रथम
- सूक्त: तृतीय
- मन्त्र: चतुर्थ — १.३.४
- ऋषि: अथर्वा
- देवता: चन्द्रमा
- छन्द: अनुष्टुप्
- मुख्य विषय: चन्द्रमा, ओषधि-सम्बन्ध और शरीर से द्रव का बहिर्गमन
यह मन्त्र पिछले मन्त्र के भाव से जुड़ा हुआ है। वहाँ वरुण का स्मरण है और यहाँ चन्द्रमा का।
🌿 चन्द्रमा को ‘शरस्य पितरम्’ क्यों कहा गया?
मन्त्र में कहा गया है—
विद्मा शरस्य पितरं चन्द्रम्…
अर्थात् हम चन्द्रमा को शर का पिता जानते हैं।
वैदिक साहित्य में चन्द्रमा का सम्बन्ध ओषधियों और उनके रस से जोड़ा गया है। चन्द्रमा की शीतलता, रात्रि, जल-चक्र और वनस्पति-जगत के साथ उसका सम्बन्ध वैदिक चिन्तन में विशेष महत्व रखता है।
इसलिए यहाँ चन्द्रमा को केवल आकाश में दिखाई देने वाले ग्रह/पिण्ड के रूप में नहीं, बल्कि वैदिक देवता और प्राकृतिक व्यवस्था के एक अधिष्ठाता के रूप में समझना चाहिए।
🕉️ पद-पद अर्थ
विद्म
हम जानते हैं, पहचानते हैं।
शरस्य
‘शर’ के।
पितरम्
पिता, उत्पादक अथवा मूल कारण।
चन्द्रम्
चन्द्रमा को।
शतवृष्ण्यम्
अत्यधिक सामर्थ्य वाले अथवा प्रबल शक्ति से युक्त।
तेन
उसके द्वारा अथवा उसके अनुग्रह से।
ते
तुम्हारे।
तन्वे
शरीर के लिए।
शम्
कल्याण, सुख, शान्ति अथवा आरोग्य।
करम्
कल्याण करने वाला / कल्याण की स्थापना करने वाला।
पृथिव्याम्
पृथ्वी पर।
ते
तुम्हारा।
निषेचनम्
बहिर्गमन, स्राव अथवा प्रवाह।
बहिः
बाहर।
अस्तु
हो।
इस प्रकार मन्त्र में शरीर के लिए कल्याण तथा द्रव के शरीर से बाहर निकलने की कामना व्यक्त होती है।
🌙 सायणाचार्य की व्याख्या के संदर्भ में चन्द्रमा
सायणाचार्य की व्याख्या में चन्द्रमा का सम्बन्ध उसके आह्लादकारी एवं शीतल स्वरूप से किया जाता है।
चन्द्र शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में वैदिक निरुक्त-परम्परा भी चन्द्रमा को कान्ति और आह्लाद से सम्बद्ध करती है।
यास्काचार्य की निरुक्त परम्परा में चन्द्रमा के सम्बन्ध में—
चन्द्रश्चन्दतेः कान्तिकर्मणः
का उल्लेख मिलता है।
अर्थात् चन्द्रमा का नाम उसकी कान्ति तथा आह्लादकारी स्वरूप से सम्बन्धित माना गया है।
🌿 ओषधियों और चन्द्रमा का सम्बन्ध
वैदिक साहित्य में चन्द्रमा और ओषधियों का सम्बन्ध महत्वपूर्ण विषय है। ओषधियाँ पृथ्वी पर जीवन और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं तथा चन्द्रमा को वैदिक परम्परा में उनके रस एवं पोषण से जोड़ा गया है।
इस मन्त्र में चन्द्रमा को शरस्य पितरम् कहने की व्याख्या इसी व्यापक प्राकृतिक और वैदिक सम्बन्ध की पृष्ठभूमि में की जा सकती है।
इस प्रकार मन्त्र में तीन प्रमुख तत्व दिखाई देते हैं—
चन्द्रमा → रस/ओषधि → शरीर का कल्याण
💧 ‘निषेचन’ और शरीर से बहिर्गमन
मन्त्र का एक महत्वपूर्ण शब्द है—
निषेचनम्
इसके साथ—
बहिः ते अस्तु
अर्थात् ‘तुम्हारा निषेचन बाहर हो’—ऐसी कामना व्यक्त की गई है।
इसी कारण इस मन्त्र को शरीर में रुके हुए द्रव के बहिर्गमन तथा मूत्र-प्रवाह से सम्बन्धित अथर्ववैदिक प्रयोगों के संदर्भ में पढ़ा जाता है।
यहाँ मन्त्र का भाव शरीर में अवरोध के स्थान पर प्राकृतिक प्रवाह और बहिर्गमन की कामना का है।
🔬 वैदिक चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा
अथर्ववेद में अनेक मन्त्र रोग, औषधि, शरीर तथा स्वास्थ्य से सम्बन्धित हैं। आधुनिक पाठक इन मन्त्रों को चिकित्सा-विज्ञान के इतिहास और प्राचीन चिकित्सा-परम्पराओं के संदर्भ में अध्ययन कर सकते हैं।
लेकिन वैदिक मन्त्र के पारम्परिक प्रयोग को आधुनिक चिकित्सा में किसी रोग का प्रमाणित उपचार मानना उचित नहीं है।
आज मूत्र रुकने या बहुत कम होने के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे—
- मूत्रमार्ग में अवरोध
- प्रोस्टेट से सम्बन्धित समस्या
- मूत्र संक्रमण
- मूत्राशय की कार्यक्षमता में समस्या
- कुछ औषधियों का प्रभाव
- तंत्रिका संबंधी विकार
यदि किसी व्यक्ति को अचानक मूत्र बिल्कुल नहीं हो रहा हो, निचले पेट में तेज दर्द या अत्यधिक दबाव महसूस हो रहा हो, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।
🌺 मन्त्र का भावार्थ
इस मन्त्र का सरल भाव इस प्रकार समझा जा सकता है—
“हम उस सामर्थ्यवान चन्द्रमा को जानते हैं जो शर का पिता है। उसके द्वारा तुम्हारे शरीर का कल्याण हो। तुम्हारा यह निषेचन शरीर से बाहर पृथ्वी पर प्रवाहित हो।”
यहाँ “शम्” शरीर के कल्याण और “निषेचनम् बहिः” प्राकृतिक बहिर्गमन की कामना को व्यक्त करता है।
🔱 पिछले मन्त्र से सम्बन्ध
अथर्ववेद १.३.३ और १.३.४ को साथ पढ़ने पर एक रोचक क्रम दिखाई देता है।
१.३.३ — वरुण
विद्मा शरस्य पितरं वरुणम्…
१.३.४ — चन्द्रमा
विद्मा शरस्य पितरं चन्द्रम्…
दोनों मन्त्रों की संरचना में समानता है। दोनों में शरस्य पितरम् तथा शरीर के कल्याण और निषेचन के बाहर होने की कामना आती है।
इससे सूक्त में जल, प्राकृतिक प्रवाह, चन्द्रमा, वरुण और शरीर के स्वास्थ्य के बीच स्थापित वैदिक सम्बन्ध को समझने में सहायता मिलती है।
📚 निष्कर्ष
अथर्ववेद १.३.४ में चन्द्रमा को शरस्य पितरम् कहकर स्मरण किया गया है और शरीर के कल्याण तथा निषेचन के बहिर्गमन की प्रार्थना की गई है।
वैदिक परम्परा में चन्द्रमा का सम्बन्ध ओषधियों और रस से होने के कारण यह मन्त्र चन्द्रमा, प्राकृतिक द्रव-चक्र, ओषधि और स्वास्थ्य के पारस्परिक सम्बन्ध को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
अथर्ववेद के ऐसे मन्त्र हमें यह भी दिखाते हैं कि प्राचीन वैदिक परम्परा में स्वास्थ्य को केवल शरीर की समस्या न मानकर प्रकृति, जल, ओषधि और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था से जोड़कर देखा गया।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

