ब्रह्माण्डीय शक्तियों और मेधा का आह्वान
भूमिका
अथर्ववेद के प्रथम सूक्त का प्रथम मन्त्र अत्यंत गूढ़ और विचारपूर्ण है। इसमें ऐसी शक्तियों का स्मरण किया गया है जो सम्पूर्ण विश्व के विविध रूपों को धारण करती हुई गतिशील हैं। मन्त्र में साधक वाचस्पति से प्रार्थना करता है कि उन शक्तियों का बल उसके शरीर और अन्तःकरण में स्थापित हो।
यह मन्त्र विशेष रूप से मेधा, ज्ञान, स्मरणशक्ति, वाणी और आन्तरिक सामर्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक परम्परा में इसका सम्बन्ध ज्ञान की प्राप्ति तथा बुद्धि की उन्नति से जोड़ा गया है।
अथर्ववेद १.१.१ का मूल मन्त्र
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः ।
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥
सरल भावार्थ
जो त्रिषप्त अर्थात् तीन-सात के समूहों में वर्णित शक्तियाँ सम्पूर्ण विश्व के विविध रूपों को धारण करती हुई सर्वत्र गतिशील हैं, उन सबका बल और सामर्थ्य वाणी तथा ज्ञान के स्वामी वाचस्पति आज मेरे शरीर और अन्तःकरण में स्थापित करें।
पदच्छेद
ये । त्रिऽसप्ताः । परिऽयन्ति । विश्वा । रूपाणि । बिभ्रतः । वाचः । पतिः । बला । तेषाम् । तन्वः । अद्य । दधातु । मे ॥
शब्दार्थ
ये — जो
त्रिषप्ताः — त्रि-सप्त अर्थात् तीन और सात से सम्बद्ध शक्तियाँ; परम्परागत व्याख्या में २१ का संकेत भी माना गया है।
परियन्ति — चारों ओर गतिशील होते हैं, विचरण करते हैं, व्याप्त होते हैं।
विश्वा — सभी, सम्पूर्ण।
रूपाणि — रूपों, आकारों, विविध अभिव्यक्तियों को।
बिभ्रतः — धारण करते हुए, वहन करते हुए।
वाचस्पतिः — वाणी एवं ज्ञान के स्वामी।
बला — बल, सामर्थ्य, शक्ति।
तेषाम् — उन शक्तियों का।
तन्वः — शरीर में, अपने स्वरूप में।
अद्य — आज, इस समय।
दधातु — स्थापित करें, धारण कराएँ।
मे — मेरे लिए, मेरे भीतर।
मन्त्र का विस्तृत भावार्थ
मन्त्र में साधक ऐसी व्यापक शक्तियों का आह्वान करता है जो सम्पूर्ण जगत के विविध रूपों को धारण करती हुई निरन्तर गतिशील हैं। वह प्रार्थना करता है कि उन शक्तियों का बल उसके भीतर स्थापित हो।
यहाँ ‘वाचस्पति’ केवल बोलने की क्षमता के स्वामी के रूप में नहीं, बल्कि वाणी, ज्ञान और अभिव्यक्ति के अधिष्ठाता के रूप में समझे जा सकते हैं।
इस दृष्टि से मन्त्र का मूल भाव है—
“हे ज्ञान और वाणी के अधिष्ठाता! जो शक्तियाँ सम्पूर्ण विश्व के विविध रूपों को धारण करती हुई गतिशील हैं, उन शक्तियों का बल और सामर्थ्य मेरे शरीर तथा अन्तःकरण में स्थापित हो, जिससे मैं ज्ञान को ग्रहण, धारण और अभिव्यक्त कर सकूँ।”
‘त्रिषप्ताः’ का रहस्य
इस मन्त्र का सबसे महत्वपूर्ण और गूढ़ शब्द है—‘त्रिषप्ताः’।
‘त्रि’ का अर्थ तीन और ‘सप्त’ का अर्थ सात है। वैदिक साहित्य में तीन और सात की संख्याएँ अनेक प्रतीकात्मक एवं दार्शनिक संदर्भों में आती हैं। इसलिए ‘त्रिषप्ताः’ की व्याख्या केवल एक सामान्य संख्या के रूप में करना पर्याप्त नहीं है।
एक व्याख्या में इसे तीन गुना सात अर्थात् २१ से जोड़ा जाता है।
वैदिक एवं उत्तरवर्ती दार्शनिक परम्पराओं में २१ की संख्या को विभिन्न प्रकार के तत्त्व-समूहों से समझाने के प्रयास मिलते हैं।
एक दार्शनिक व्याख्या के अनुसार इसे इस प्रकार देखा जा सकता है—
- ५ महाभूत
- ५ प्राण
- ५ ज्ञानेन्द्रियाँ
- ५ कर्मेन्द्रियाँ
- १ अन्तःकरण
इनका योग:
५ + ५ + ५ + ५ + १ = २१
हालाँकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस २१-तत्त्व व्याख्या को मन्त्र के एकमात्र और निर्विवाद अर्थ के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। यह वैदिक मन्त्र की एक दार्शनिक व्याख्या है।
सायणाचार्य की दृष्टि से मन्त्र
वैदिक भाष्य-परम्परा में सायणाचार्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मन्त्र को मेधा और ज्ञान की दृष्टि से समझने पर इसका केन्द्र साधक के भीतर ज्ञान-शक्ति की स्थापना दिखाई देता है।
मन्त्र में विश्व को धारण करने वाली शक्तियों के बल को अपने भीतर स्थापित करने की प्रार्थना की गई है।
इसका तात्पर्य केवल बाहरी शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि—
ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता, स्मरण रखने की शक्ति, विचार करने की क्षमता और उचित वाणी में उसे व्यक्त करने की सामर्थ्य प्राप्त करना भी माना जा सकता है।
इसलिए विद्यार्थी, अध्यापक, वक्ता और ज्ञान-साधक के लिए यह मन्त्र विशेष अर्थ रखता है।
वाचस्पति का अर्थ
मन्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद है—
वाचस्पतिः
इसका सामान्य विग्रह है—
वाचः पतिः = वाणी का स्वामी।
‘वाक्’ केवल उच्चारित शब्द नहीं है। भारतीय ज्ञान-परम्परा में वाणी का सम्बन्ध विचार, ज्ञान और अभिव्यक्ति से भी जोड़ा जाता है।
इसलिए वाचस्पति को व्यापक अर्थ में—
ज्ञान, वाणी और अभिव्यक्ति के अधिष्ठाता
के रूप में समझा जा सकता है।
मन्त्र में साधक वाचस्पति से उन शक्तियों के बल को अपने भीतर स्थापित करने की प्रार्थना करता है।
व्याकरणिक विवेचन
१. त्रिषप्ताः
‘त्रिषप्त’ पद में ‘त्रि’ और ‘सप्त’ दोनों संख्यात्मक पदों का सम्बन्ध है। इसका अर्थ तीन-सात अथवा तीन बार सात से सम्बन्धित समूह के रूप में लिया जा सकता है।
इसकी व्याख्या परम्परा के अनुसार अलग-अलग प्रकार से की गई है।
२. परियन्ति
‘परि’ उपसर्ग के साथ गति या गमन का भाव व्यक्त होता है।
परि + इ = परियन्ति
अर्थ—
चारों ओर गतिशील होना, विचरण करना या व्याप्त होना।
मन्त्र में यह पद उन शक्तियों की गतिशीलता को व्यक्त करता है।
३. बिभ्रतः
‘बिभ्रतः’ का सम्बन्ध भृ धातु से है, जिसका मूल अर्थ धारण करना, वहन करना या पोषण करना है।
अर्थ—
धारण करते हुए, वहन करते हुए।
इससे संकेत मिलता है कि वर्णित शक्तियाँ विश्व के विभिन्न रूपों को धारण करती हैं।
४. वाचस्पतिः
वाचः + पतिः = वाचस्पतिः
अर्थ—
वाणी का स्वामी।
यह समासिक रूप है और मन्त्र में ज्ञान तथा वाणी के अधिष्ठाता के रूप में महत्वपूर्ण है।
५. दधातु
‘धा’ धातु का अर्थ है—
रखना, धारण करना, स्थापित करना।
‘दधातु’ में प्रार्थना या आज्ञा का भाव है।
अर्थ—
स्थापित करें, धारण कराएँ।
शरीर और ब्रह्माण्ड का सम्बन्ध
इस मन्त्र की एक महत्वपूर्ण दार्शनिक विशेषता Macrocosm और Microcosm, अर्थात् ब्रह्माण्ड और मानव-पिण्ड के सम्बन्ध की ओर संकेत करना है।
मन्त्र में बाहर व्याप्त शक्तियों और भीतर उनके बल की स्थापना की प्रार्थना है।
भारतीय दर्शन में मानव को केवल एक पृथक जैविक शरीर के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे व्यापक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का एक अंग माना गया है।
इस दृष्टि से मन्त्र का भाव है—
जो शक्ति विश्व में कार्य कर रही है, उसका सामर्थ्य मानव के भीतर भी जागृत हो।
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से इस मन्त्र को पढ़ते समय एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।
मन्त्र में वर्णित ‘त्रिषप्त’ को सीधे आधुनिक भौतिकी के किसी निश्चित वैज्ञानिक सिद्धान्त के बराबर रखना प्रमाणित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है।
फिर भी मन्त्र की कुछ अवधारणाओं की आधुनिक विचारों से तुलनात्मक समानता दिखाई देती है।
उदाहरण के लिए, आधुनिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ और ऊर्जा की विभिन्न प्रणालियाँ निरन्तर परिवर्तन और गति में रहती हैं। मानव शरीर में भी श्वसन, रक्तसंचार, तंत्रिका-संचार, चयापचय और कोशिकीय गतिविधियाँ निरन्तर चलती रहती हैं।
मन्त्र में प्रयुक्त ‘परियन्ति’ अर्थात् गतिशीलता का विचार इस व्यापक प्राकृतिक गतिशीलता से तुलनात्मक रूप से जोड़ा जा सकता है।
लेकिन इसे यह कहना कि आधुनिक विज्ञान ने इस मन्त्र में वर्णित २१ तत्त्वों को प्रमाणित कर दिया है, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
वाचस्पति और मस्तिष्क
मन्त्र में ज्ञान और वाणी की शक्ति के लिए वाचस्पति का आह्वान किया गया है।
आधुनिक न्यूरोसाइंस में भाषा, स्मृति, ध्यान और निर्णय से जुड़े मस्तिष्क के अनेक क्षेत्र और नेटवर्क पहचाने गए हैं। उदाहरण के लिए, भाषा-प्रसंस्करण में Broca’s area और Wernicke’s area जैसे क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
परन्तु इस मन्त्र का उच्चारण सीधे इन विशेष मस्तिष्क क्षेत्रों को सक्रिय करता है—ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक होंगे।
अतः अधिक उचित दृष्टिकोण यह है कि मन्त्र-पाठ को ध्यान, एकाग्रता, मानसिक अनुशासन और सकारात्मक संकल्प की परम्परागत साधना के रूप में समझा जाए।
विद्यार्थियों के लिए मन्त्र का महत्व
विद्यार्थी के जीवन में तीन क्षमताएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—
१. ग्रहण शक्ति
२. स्मरण शक्ति
३. अभिव्यक्ति शक्ति
यह मन्त्र इन तीनों के प्रतीकात्मक समन्वय की प्रेरणा देता है।
अध्ययन से पहले कुछ समय शांत होकर मन्त्र का उच्चारण करने से विद्यार्थी अपने मन को अध्ययन के लिए तैयार कर सकता है।
इसका उद्देश्य किसी चमत्कारिक परिणाम की अपेक्षा करना नहीं, बल्कि—
“अब मेरा मन अध्ययन, स्मरण और ज्ञान के लिए एकाग्र है।”
जैसा सकारात्मक मानसिक संकल्प विकसित करना है।
शिक्षकों और वक्ताओं के लिए उपयोग
शिक्षक, वक्ता, आचार्य और अन्य ज्ञान-आधारित कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए ‘वाचस्पति’ की अवधारणा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
ज्ञान तभी प्रभावी बनता है जब—
ज्ञान → विचार → वाणी → श्रोता तक स्पष्ट अभिव्यक्ति
के रूप में प्रवाहित हो।
इसलिए मन्त्र का ध्यान करते समय व्यक्ति अपने भीतर स्पष्ट विचार, संयमित वाणी और सार्थक अभिव्यक्ति का संकल्प विकसित कर सकता है।
मानसिक एकाग्रता और आत्म-अनुशासन
आज के समय में मन अनेक प्रकार के बाहरी उद्दीपनों से लगातार प्रभावित होता रहता है।
मोबाइल, सोशल मीडिया, समाचार और लगातार आने वाली सूचनाएँ मन की एकाग्रता को प्रभावित कर सकती हैं।
ऐसे समय में वैदिक मन्त्र-पाठ एक ध्यानात्मक अनुशासन का कार्य कर सकता है।
मन्त्र के शब्दों, उच्चारण और अर्थ पर मन को केन्द्रित करने से व्यक्ति कुछ समय के लिए बाहरी विकर्षणों से हटकर एक निश्चित विचार पर ध्यान केन्द्रित करता है।
इस दृष्टि से यह मन्त्र केवल धार्मिक पाठ न होकर मानसिक एकाग्रता और आत्म-संकल्प की साधना के रूप में भी समझा जा सकता है।
दैनिक जीवन में प्रयोग
प्रातःकाल शांत वातावरण में इस मन्त्र का अर्थ समझकर उच्चारण किया जा सकता है।
मन्त्र-पाठ के साथ निम्न संकल्प उपयोगी हो सकता है—
“मैं ज्ञान को ग्रहण करने, उसे धारण करने और उचित वाणी से व्यक्त करने के लिए अपने मन को एकाग्र कर रहा हूँ।”
विद्यार्थी इसे अध्ययन से पहले, शिक्षक अध्यापन से पहले तथा वक्ता महत्वपूर्ण संवाद से पहले ध्यानपूर्वक कर सकते हैं।
यहाँ मुख्य उद्देश्य केवल मन्त्र की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि मन्त्र के अर्थ और भाव पर मन को केन्द्रित करना है।
मन्त्र का दार्शनिक संदेश
इस मन्त्र का व्यापक संदेश कुछ शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है—
ब्रह्माण्ड में व्याप्त शक्ति को पहचानो।
उस शक्ति के प्रति सजग बनो।
अपने भीतर ज्ञान और सामर्थ्य को विकसित करो।
वाणी को ज्ञान का माध्यम बनाओ।
और अपनी चेतना को एकाग्र करके जीवन को सार्थक बनाओ।
निष्कर्ष
अथर्ववेद १.१.१ का यह मन्त्र वैदिक चिन्तन में ब्रह्माण्ड, शक्ति, वाणी और मानव-अन्तःकरण के बीच सम्बन्ध की एक गहन कल्पना प्रस्तुत करता है।
‘त्रिषप्ताः’ मन्त्र का सबसे रहस्यमय पद है, जिसकी विभिन्न परम्परागत व्याख्याएँ संभव हैं। इसे २१ शक्तियों या तत्त्वों से जोड़ना एक महत्वपूर्ण दार्शनिक व्याख्या है, परन्तु इसे मन्त्र का एकमात्र निश्चित अर्थ नहीं माना जाना चाहिए।
‘वाचस्पति’ ज्ञान और वाणी की शक्ति का महत्वपूर्ण प्रतीक है, जबकि ‘दधातु मे’ साधक की वह प्रार्थना है जिसमें वह व्यापक शक्ति को अपने भीतर स्थापित करने की कामना करता है।
आधुनिक दृष्टि से यह मन्त्र ध्यान, एकाग्रता, आत्म-संकल्प, ज्ञान-ग्रहण और प्रभावी अभिव्यक्ति जैसे विषयों पर विचार करने का अवसर देता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसके प्रतीकात्मक अर्थों और प्रत्यक्ष प्रमाणित वैज्ञानिक निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
इस प्रकार अथर्ववेद का यह प्रथम मन्त्र केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति, वाणी और आत्म-विकास की ओर उन्मुख एक वैदिक संकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है।
ॐ। ज्ञानं मेधा च वर्धताम्।

