1. प्रस्तावना

वर्णोच्चारण को केवल वर्णों की पहचान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। शास्त्रीय शिक्षा-परम्परा में यह भी बताया जाता है कि वर्ण किस स्थान से, किस करण द्वारा, किस प्रयत्न से और किस प्रकार की वायु-क्रिया के साथ उच्चरित होता है।

पाणिनीय शिक्षा में वर्णोच्चारण की प्रक्रिया को समझाने के लिए विभिन्न विषयों का क्रमबद्ध विवेचन मिलता है। इस पाठ में उन आठ प्रमुख प्रकरणों का परिचय प्राप्त करेंगे।

2. आठ प्रकरण

इस पाठ्यक्रम में आठ प्रमुख विषय इस प्रकार समझे जाएंगे:

  1. स्थान
  2. करण
  3. आभ्यन्तर प्रयत्न
  4. बाह्य प्रयत्न
  5. स्थान में वायु का ताड़न
  6. वृत्तिकार
  7. प्रक्रम
  8. नाभि के अधोभाग से वायु का उत्थान

इनका उद्देश्य वर्णोच्चारण की पूरी प्रक्रिया को क्रम से समझना है।

3. स्थान

स्थान से तात्पर्य उस मुख-प्रदेश या उच्चारण-स्थान से है जहाँ वर्ण के निर्माण में मुख्य भूमिका होती है।

प्रमुख स्थान हैं:

  • कण्ठ
  • तालु
  • मूर्धा
  • दन्त
  • ओष्ठ
  • नासिका

उदाहरण:

— कण्ठ्य
— तालव्य
— मूर्धन्य
— दन्त्य
— ओष्ठ्य

4. करण

करण वह उच्चारण-अंग या साधन है जिसके द्वारा वर्ण की ध्वनि को विशेष रूप दिया जाता है।

उच्चारण में जिह्वा, तालु, दन्त, ओष्ठ तथा अन्य मुख-अवयवों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उदाहरण के लिए के उच्चारण में जिह्वा और दन्त का विशेष सम्बन्ध होता है, जबकि के उच्चारण में दोनों ओष्ठों की प्रमुख भूमिका होती है।

5. आभ्यन्तर प्रयत्न

वर्ण के उच्चारण के समय मुख के भीतर होने वाली क्रिया को आभ्यन्तर प्रयत्न के अन्तर्गत समझा जाता है।

इसके प्रमुख भेद हैं:

  • स्पृष्ट
  • ईषत्स्पृष्ट
  • ईषद्विवृत
  • विवृत
  • संवृत

इनके माध्यम से यह समझने में सहायता मिलती है कि उच्चारण के समय मुख के भीतर वायु के मार्ग और अवरोध की स्थिति कैसी है।

6. बाह्य प्रयत्न

वर्णोच्चारण के समय ध्वनि और वायु से सम्बन्धित बाहरी विशेषताओं का विचार बाह्य प्रयत्न में किया जाता है।

इसमें प्रमुख रूप से निम्न भेदों का अध्ययन होता है:

  • घोष
  • अघोष
  • अल्पप्राण
  • महाप्राण
  • श्वास आदि

इनका अभ्यास विद्यार्थी को वर्णों के सूक्ष्म भेद समझने में सहायता करता है।

7. स्थान में वायु का ताड़न

वर्ण उत्पन्न करने के लिए वायु का उचित प्रकार से उच्चारण-स्थान की ओर प्रवाह आवश्यक है। स्थान और वायु की पारस्परिक क्रिया से वर्ण की विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न होती है।

इसी कारण केवल वर्ण का नाम जानना पर्याप्त नहीं है; उसके उच्चारण की प्रक्रिया को समझना भी आवश्यक है।

8. वृत्तिकार और प्रक्रम

शिक्षा-परम्परा में वर्णोच्चारण की प्रक्रिया के क्रम और उससे सम्बन्धित विवरण का भी विवेचन किया जाता है।

प्रक्रम को सरल रूप में उच्चारण की क्रमबद्ध प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है—वायु के उत्थान से लेकर वर्ण की स्पष्ट ध्वनि उत्पन्न होने तक।

9. नाभि के अधोभाग से वायु का उत्थान

शास्त्रीय वर्णन में शरीर के भीतर से वायु के ऊपर की ओर उठने और उच्चारण-स्थान तक पहुँचने की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है।

इस पाठ्यक्रम में इसे वर्णोच्चारण की परम्परागत शास्त्रीय व्याख्या के रूप में समझा जाएगा। आधुनिक शरीर-विज्ञान में श्वसन और ध्वनि-उत्पत्ति की अपनी अलग वैज्ञानिक व्याख्या है; दोनों दृष्टिकोणों को अलग-अलग समझना उचित है।

10. आठ प्रकरणों का सार

वायु का उत्थान → उच्चारण-स्थान → करण → आभ्यन्तर प्रयत्न → बाह्य प्रयत्न → वायु की क्रिया → प्रक्रम → स्पष्ट वर्ण

इस क्रम से विद्यार्थी को वर्णोच्चारण की पूरी प्रक्रिया का एक व्यवस्थित दृष्टिकोण प्राप्त होता है।

11. अभ्यास

प्रश्न 1: पाणिनीय शिक्षा के आठ प्रमुख प्रकरणों के नाम लिखिए।

प्रश्न 2: स्थान और करण में क्या अंतर है?

प्रश्न 3: आभ्यन्तर प्रयत्न के पाँच भेद लिखिए।

प्रश्न 4: बाह्य प्रयत्न में किन प्रमुख भेदों का अध्ययन किया जाता है?

प्रश्न 5: वर्णोच्चारण में वायु की क्या भूमिका है?

अभ्यास कार्य

विद्यार्थी निम्न पाँच वर्णों का उच्चारण करें:

क — च — ट — त — प

प्रत्येक वर्ण के लिए लिखें:

वर्ण → उच्चारण-स्थान → प्रमुख करण → उच्चारण का अनुभव

इस अभ्यास से अगले पाठ में मुख्य उच्चारण-स्थानों और उनके शास्त्रीय सूत्रों को समझना आसान होगा।