सायणाचार्य एवं ऋषि दयानन्द सरस्वती के भाष्य के आलोक में एक तुलनात्मक अध्ययन
प्रस्तुतकर्ता: आचार्य कपिल
ऋषि विश्वामित्र विद्या फाउण्डेशन
🌞 मन्त्र एवं पाठ परिचय
ऋग्वेद १.३५.७
वि सुपर्णो अन्तरिक्षाण्यख्यद्गभीरवेपाः असुरः सुनीथः ।
क्वेदानीं सूर्यः कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान ॥ ७ ॥
पदपाठ
वि । सुपर्णः । अन्तरिक्षाणि । अख्यत् । गभीरवेपाः । असुरः । सुनीथः । क्व । इदानीम् । सूर्यः । कः । चिकेत । कतमाम् । द्याम् । रश्मिः । अस्य । आ । ततान ॥ ७ ॥
यह मन्त्र सूर्य के प्रकाश, उसकी गति, उसकी किरणों तथा रात्रिकाल में उसके अदृश्य होने से सम्बन्धित एक अत्यन्त विचारणीय प्रश्न प्रस्तुत करता है। मन्त्र में सूर्य के लिए सुपर्ण, गभीरवेपस्, असुर और सुनीथ जैसे विशेषण प्रयुक्त हुए हैं तथा अन्त में प्रश्न किया गया है—सूर्य अभी कहाँ है और उसकी किरण किस द्युलोक को व्याप्त कर रही है?
१. सायणाचार्य के भाष्य के अनुसार
शब्दार्थ
सुपर्णः — सुन्दर गति वाला; अथवा निघण्टु में रश्मि के नामों में गृहीत होने के कारण सूर्य की किरण के अर्थ में भी ग्रहण किया गया है।
अन्तरिक्षाणि — अन्तरिक्ष से उपलक्षित लोकत्रय के स्थान।
वि अख्यत् — विशेष रूप से प्रकाशित किया।
गभीरवेपाः — गम्भीर कम्पन अथवा गति वाला, जिसकी गति सामान्य दृष्टि से सहज रूप से लक्षित नहीं होती।
असुरः — सबको प्राण देने वाला। सायणाचार्य की व्याख्या में इसका सम्बन्ध प्राणदायक स्वरूप से किया गया है।
सुनीथः — उत्तम मार्ग का नयन करने वाला अथवा मार्ग को प्रकाशित करके अभीष्ट स्थान तक पहुँचाने वाला।
इदानीम् — इस समय, विशेषतः रात्रिकाल के सन्दर्भ में।
सूर्यः — सूर्य तथा उसकी रश्मियाँ।
क्व — कहाँ?
कः चिकेत — इसे कौन जानता है? अर्थात् इस रहस्य को सामान्य रूप से कौन जान सकता है?
अस्य — इस सूर्य का।
रश्मिः — किरण।
कतमाम् द्याम् — किस द्युलोक को?
आ ततान — व्याप्त किया है अथवा फैला हुआ है।
सायण-पक्ष के शब्दार्थ और अनुवाद में सूर्य की रश्मियों द्वारा प्रकाश तथा रात्रि में सूर्य के अदृश्य होने का प्रश्न प्रमुख रूप से सामने आता है।
सायणाचार्य मतानुसार भावार्थ
सुन्दर गति वाले, गम्भीर गति अथवा कम्पन वाले, सबके प्राणदाता तथा उत्तम मार्ग दिखाने वाले सूर्य की किरणरूपी सुपर्ण ने दिन में अन्तरिक्ष से सम्बद्ध लोकों को भली-भाँति प्रकाशित किया।
किन्तु अब रात्रि के समय यह सूर्य कहाँ है? इस रहस्य को कौन जानता है? और इस सूर्य की कौन-सी किरण किस द्युलोक को व्याप्त कर रही है—यह भी कौन जानता है?
इस प्रकार मन्त्र सूर्य के दृश्य प्रकाश और उसके रात्रिकालीन अदृश्य स्वरूप के मध्य एक गूढ़ प्रश्न उपस्थित करता है।
२. सायण-पक्ष का व्याकरणिक विवेचन
सुपर्णः
‘सु’ उपसर्ग/प्रत्ययात्मक अर्थ से निर्मित पद है। सायण-पक्ष में इसे सुन्दर गति अथवा रश्मि-संबन्धी अर्थ में ग्रहण किया गया है।
गभीरवेपाः
‘टुवेपृ कम्पने’ धातु से ‘असुन्’ प्रत्यय की व्युत्पत्ति मानी गई है।
‘गम्भीरं वेपो यस्य’ के आधार पर यह बहुव्रीहि समास के रूप में व्याख्यायित होता है।
असुरः
‘असु’ से सम्बन्धित व्युत्पत्ति की विभिन्न सम्भावनाएँ प्रस्तुत की गई हैं। एक व्याख्या में ‘असु क्षेपणे’ धातु से ‘उरन्’ प्रत्यय माना गया है; दूसरी व्याख्या में ‘असून् प्राणान् राति’ अर्थात् जो प्राणों को धारण/प्रदान करता है, ऐसा अर्थ ग्रहण किया गया है।
सुनीथः
‘णीञ् प्रापणे’ धातु से ‘क्थन्’ प्रत्यय द्वारा इसकी व्युत्पत्ति मानी गई है। ‘सु + नीथ’ के आधार पर श्रेष्ठ मार्ग या उत्तम नयन का अर्थ प्रकट होता है।
इदानीम्
‘इदम्’ शब्द से सप्तम्यर्थ में ‘दानीं च’ सूत्र के द्वारा ‘दानीम्’ रूप की व्युत्पत्ति मानी गई है।
सूर्यः
‘षू प्रेरणे’ धातु से सम्बन्धित व्युत्पत्ति मानी गई है तथा इसे निपातित रूप के रूप में भी समझाया गया है।
चिकेत
‘कित् ज्ञाने’ धातु से लिट् लकार का रूप माना गया है। इसका अर्थ है—जानता है, समझता है या बोध करता है।
कतमाम्
‘किम्’ शब्द से बहुवचन में विकल्प/प्रश्न के अर्थ में ‘डतमच्’ प्रत्यय द्वारा निर्मित रूप माना गया है।
३. ऋषि दयानन्द सरस्वती के भाष्य के अनुसार
अन्वय
हे विद्वन्! यथा असुरः गभीरवेपाः सुनीथः सुपर्णः अस्य रश्मिः अन्तरिक्षाणि व्यख्यत्, तेन रश्मिगणेन युक्तः सूर्यः इदानीं क्व वर्त्तते? एतत् कः चिकेत? कतमां द्याम् अस्य सूर्यस्य रश्मिः आ ततान, एतत् अपि कः चिकेत? कश्चिदेव जानाति न तु सर्वे, तत् एतत् त्वम् अवेहि ॥ ७ ॥
दयानन्दीय व्याख्या में मन्त्र को विद्वान् के प्रति सम्बोधित करते हुए सूर्य की गति, प्रकाश और उसकी किरणों के व्यापक प्रभाव पर विचार करने का अवसर माना गया है।
शब्दार्थ
वि — विशेष रूप से।
सुपर्णः — सुन्दर गति वाला अथवा शोभन किरणों वाला।
अन्तरिक्षाणि — अन्तरिक्ष में स्थित सभी भुवन अथवा लोक।
अख्यत् — विशेष रूप से प्रकाशित करता है।
गभीरवेपाः — गम्भीर कम्पन अथवा गति वाला, जिसे सामान्य दृष्टि से सहजता से लक्षित करना कठिन हो।
असुरः — सबको प्राण देने वाला अथवा प्राणों में रमण करने वाला।
सुनीथः — जिसके द्वारा उत्तम प्राप्ति तथा श्रेष्ठ मार्ग का नयन होता है।
क्व — कहाँ?
इदानीम् — इस समय, रात्रिकाल के सन्दर्भ में।
सूर्यः — वह सूर्य।
कः — कौन?
चिकेत — कौन जानता है अथवा बोध करता है?
कतमाम् — अनेक में से किसको?
द्याम् — प्रकाशमय द्युलोक को।
रश्मिः — ज्योति अथवा किरण।
अस्य — इस सूर्य की।
आ ततान — चारों ओर फैलाता है अथवा व्याप्त करता है।
४. दयानन्द सरस्वती मतानुसार भावार्थ
हे विद्वान्! जैसे वह असुर अर्थात् सबको प्राण देने वाला, गभीरवेपाः अर्थात् गम्भीर गति या कम्पन वाला, सुनीथः अर्थात् उत्तम मार्ग का नयन करने वाला और सुपर्णः अर्थात् शोभन किरणों वाला सूर्य अपनी किरणों से अन्तरिक्ष में स्थित सभी लोकों को विशेष रूप से प्रकाशित करता है, वैसे उस सूर्य के सम्बन्ध में यह प्रश्न है कि रात्रि के समय वह कहाँ विद्यमान रहता है?
इस रहस्य को कौन जानता है?
और इस सूर्य की कौन-सी किरण किस प्रकाशमय द्युलोक को भली-भाँति व्याप्त करती है—इस बात को भी कौन जानता है?
अर्थात् यह विषय सामान्य ज्ञान का नहीं, बल्कि विशेष ज्ञान और सूक्ष्म निरीक्षण का विषय है।
५. सायण और दयानन्द — तुलनात्मक दृष्टि
| मन्त्र-पद | सायणाचार्य की दृष्टि | दयानन्द सरस्वती की दृष्टि |
|---|---|---|
| सुपर्णः | सुन्दर गति वाला / रश्मि | शोभन गति एवं किरणों वाला |
| गभीरवेपाः | गम्भीर गति या कम्पन वाला | सूक्ष्म एवं गम्भीर गति वाला |
| असुरः | प्राणदाता | प्राणदाता / प्राणों में रमण करने वाला |
| सुनीथः | उत्तम मार्ग दिखाने वाला | श्रेष्ठ मार्ग का नयन करने वाला |
| अन्तरिक्षाणि | लोकत्रय से सम्बद्ध स्थान | अन्तरिक्षस्थित भुवन |
| इदानीम् | वर्तमान रात्रिकाल | वर्तमान रात्रिकाल |
| कः चिकेत | कौन जानता है? | कौन विद्वान् जानता है? |
| रश्मिः | सूर्य की किरण | ज्योति / सूर्य की किरण |
| कतमां द्याम् | किस द्युलोक को | अनेक लोकों में से किस प्रकाशमय लोक को |
दोनों व्याख्याओं में सूर्य का प्रकाश, गति, रश्मि और रात्रिकालीन अदृश्यता प्रमुख विषय हैं, यद्यपि अर्थ-व्याख्या और दार्शनिक बलाघात में कुछ अन्तर दिखाई देता है।
६. मन्त्र का आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है कि आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्तों को मन्त्र का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक अर्थ मानना आवश्यक नहीं है। इसके स्थान पर मन्त्र में वर्णित अवधारणाओं और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के बीच तुलनात्मक साम्य का अध्ययन किया जा सकता है।
इस दृष्टिकोण से ‘गभीरवेपाः’, ‘रश्मिः’, ‘अन्तरिक्षाणि’ तथा ‘क्व इदानीं सूर्यः’ जैसे पद आधुनिक सौर-विज्ञान के कुछ विषयों पर विचार करने का अवसर प्रदान करते हैं।
७. ‘गभीरवेपाः’ और सूर्य के आन्तरिक कम्पन
मन्त्र में सूर्य के लिए गभीरवेपाः शब्द आता है, जिसका व्याख्यात्मक अर्थ गम्भीर गति या कम्पन वाला लिया गया है।
आधुनिक सौर-विज्ञान में सूर्य को एक स्थिर, कठोर ठोस पिण्ड के रूप में नहीं देखा जाता। सूर्य प्लाज़्मा से निर्मित गतिशील तारा है, जिसके भीतर निरन्तर संवहन, दाब-तरंगें और अन्य प्रकार की गतिशील प्रक्रियाएँ होती रहती हैं।
सूर्य की सतह पर होने वाले सूक्ष्म दोलनों और उसके आन्तरिक भाग में चलने वाली तरंगों के अध्ययन की आधुनिक शाखा को Helioseismology (सौर भूकम्पविज्ञान) कहा जाता है।
इन कम्पनों का अध्ययन सूर्य के आन्तरिक ढाँचे और उसकी गतिशील प्रक्रियाओं को समझने में वैज्ञानिकों की सहायता करता है।
अतः ‘गभीरवेपाः’ और सूर्य के आन्तरिक कम्पनों के बीच एक तुलनात्मक वैज्ञानिक साम्य देखा जा सकता है। इसे मन्त्र में आधुनिक Helioseismology का प्रत्यक्ष वर्णन मानने के बजाय एक वैचारिक तुलना के रूप में देखना अधिक उचित है।
८. ‘सुपर्णः’ और सूर्य की किरणें
मन्त्र में सूर्य की किरणों तथा उसके प्रकाश द्वारा अन्तरिक्ष को प्रकाशित करने की बात आती है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार सूर्य से विद्युतचुम्बकीय विकिरण निरन्तर अन्तरिक्ष में फैलता है। दृश्य प्रकाश के अतिरिक्त सूर्य से विभिन्न प्रकार का विकिरण भी निकलता है।
सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों की धारा को Solar Wind कहा जाता है, जो अन्तरिक्ष में व्यापक रूप से फैलती है।
इस प्रकार मन्त्र में वर्णित सूर्य—रश्मि—अन्तरिक्ष सम्बन्ध को आधुनिक Solar Physics के संदर्भ में तुलनात्मक रूप से समझा जा सकता है।
९. “क्वेदानीं सूर्यः” — सूर्य कहाँ है?
मन्त्र का अत्यन्त रोचक प्रश्न है—
क्वेदानीं सूर्यः कश्चिकेत?
अर्थात्—अब सूर्य कहाँ है? इसे कौन जानता है?
दृश्य अनुभव की दृष्टि से दिन में सूर्य दिखाई देता है, जबकि रात्रि में सूर्य हमारे प्रत्यक्ष दृश्य क्षेत्र में नहीं रहता।
आधुनिक खगोल-विज्ञान ने पृथ्वी के घूर्णन तथा सूर्य-पृथ्वी सम्बन्ध को समझाकर यह स्पष्ट किया है कि रात्रि में सूर्य वास्तव में अस्तित्वहीन नहीं होता, बल्कि पृथ्वी के जिस भाग पर हम स्थित हैं वहाँ सूर्य का प्रत्यक्ष प्रकाश उपलब्ध नहीं होता।
इस प्रश्न को इस प्रकार दृश्य और अदृश्य सौर स्थिति के प्रति वैदिक जिज्ञासा के रूप में पढ़ा जा सकता है।
१०. “कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान” और Far-side अध्ययन
मन्त्र का अगला प्रश्न है—
कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान?
अर्थात्—इसकी किरण किस द्युलोक को व्याप्त कर रही है?
आधुनिक सौर-अध्ययन में सूर्य का वह भाग जो पृथ्वी से प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, उसके अध्ययन के लिए विभिन्न वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। सूर्य के far-side का अध्ययन विशेष रूप से जटिल है और इसमें Helioseismology जैसी तकनीकों की सहायता ली जाती है।
इस दृष्टि से मन्त्र का प्रश्न आधुनिक वैज्ञानिक जिज्ञासा के साथ एक रोचक तुलनात्मक साम्य प्रस्तुत करता है—दृश्य क्षेत्र से परे स्थित सौर गतिविधियों को कैसे जाना जाए?
हालाँकि यह कहना अधिक वैज्ञानिक रूप से उचित है कि मन्त्र आधुनिक far-side imaging का प्रत्यक्ष तकनीकी वर्णन करता है, ऐसा दावा स्रोत-साक्ष्य से स्वतः सिद्ध नहीं होता। बल्कि दोनों के बीच विचारात्मक समानता का अध्ययन किया जा सकता है।
११. दार्शनिक एवं वैज्ञानिक जिज्ञासा
इस मन्त्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका प्रश्नात्मक स्वरूप है।
मन्त्र केवल सूर्य की स्तुति नहीं करता, बल्कि प्रश्न करता है—
सूर्य कहाँ है?
उसे कौन जानता है?
उसकी किरण किस द्युलोक को व्याप्त कर रही है?
यही प्रश्न-वृत्ति ज्ञान की खोज का आधार बनती है।
वैदिक साहित्य में प्रकृति, सूर्य, अग्नि, वायु, अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में अनेक स्थलों पर जिज्ञासा और निरीक्षण का भाव दिखाई देता है। इस मन्त्र में भी सूर्य के दृश्य प्रकाश से आगे उसके अदृश्य पक्ष को जानने की जिज्ञासा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
१२. निष्कर्ष
ऋग्वेद १.३५.७ सूर्य के प्रकाश, उसकी रश्मियों, उसकी गति तथा रात्रिकालीन अदृश्यता के सम्बन्ध में एक गम्भीर प्रश्न प्रस्तुत करता है।
सायणाचार्य की व्याख्या में सूर्य के प्राणदायक, प्रकाशदायक तथा मार्गदर्शक स्वरूप पर बल मिलता है। ऋषि दयानन्द सरस्वती की व्याख्या में भी सूर्य की रश्मियों, गति, प्रकाश और ज्ञान की आवश्यकता पर विशेष बल दिखाई देता है।
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘गभीरवेपाः’ को सूर्य के कम्पन एवं Helioseismology के संदर्भ में, ‘रश्मिः’ को Solar Radiation के संदर्भ में तथा ‘क्वेदानीं सूर्यः’ को सूर्य की दृश्य-अदृश्य स्थिति के संदर्भ में तुलनात्मक रूप से देखा जा सकता है।
लेकिन वैदिक मन्त्र की व्याख्या करते समय यह भेद बनाए रखना आवश्यक है कि वैदिक अर्थ-व्याख्या और आधुनिक वैज्ञानिक समानता दो अलग स्तर हैं। आधुनिक विज्ञान से मिलने वाला साम्य मन्त्र के अध्ययन को समृद्ध कर सकता है, परन्तु उसे आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण कहना अलग प्रकार का दावा होगा।
इसलिए ऋग्वेद १.३५.७ को वैदिक भाष्य, भाषाशास्त्र, दर्शन और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद स्थापित करने वाले एक महत्वपूर्ण अध्ययन के रूप में देखा जा सकता है।
📚 अध्ययन का सार
मन्त्र: ऋग्वेद १.३५.७
मुख्य विषय: सूर्य, रश्मि, अन्तरिक्ष, गति एवं अदृश्य सौर स्थिति
प्रमुख भाष्य-दृष्टियाँ: सायणाचार्य एवं ऋषि दयानन्द सरस्वती
आधुनिक तुलनात्मक विषय: Solar Radiation, Solar Wind, Solar Vibrations एवं Helioseismology
प्रस्तुतकर्ता:
आचार्य कपिल
ऋषि विश्वामित्र विद्या फाउण्डेशन
“वैदिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने का उद्देश्य प्राचीन मन्त्रों में जबरन आधुनिक सिद्धान्त स्थापित करना नहीं, बल्कि वैदिक जिज्ञासा और आधुनिक वैज्ञानिक अन्वेषण के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना है।”

