ऋषि विश्वामित्र विद्या फाउंडेशन
प्रस्तुतकर्ता — आचार्य कपिल
🌞 ऋग्वेद मन्त्र १.३५.५
वि जना॑ञ्छ्या॒वाः शि॑ति॒पादो॑ अख्य॒न्रथं॒ हिर॑ण्यप्रउगं॒ वह॑न्तः ।
शश्व॒द्विश॑ः सवि॒तुर्दैव्य॑स्यो॒पस्थे॒ विश्वा॒ भुव॑नानि तस्थुः ॥
📖 १. शब्दार्थ
वि अख्यन् — विशेष रूप से प्रकाशित करते हैं।
जनान् — मनुष्यों या प्राणियों को।
श्यावाः — श्याव नामक/व्यापक गति वाले सूर्य के घोड़े।
शितिपादः — श्वेत चरणों अर्थात् किरणों वाले।
रथम् — रथ अथवा प्रकाशयान को।
हिरण्यप्रउगम् — सुवर्णमय अग्रभाग वाले रथ को।
वहन्तः — वहन करते हुए।
शश्वत् — निरंतर, सर्वदा।
विशः — प्रजाएँ अथवा समस्त प्राणी।
दैव्यस्य — दिव्य गुणों वाले।
सवितुः — सूर्य अथवा प्रेरक देवता के।
उपस्थे — समीप स्थान में, गोद में।
विश्वा भुवनानि — समस्त लोक अथवा संसार।
तस्थुः — स्थित हैं, आश्रित हैं।
🔱 २. सायण भाष्य — पारंपरिक वैदिकार्थ
सायण भाष्य की दृष्टि से श्यावाः सूर्य के अश्वों का नाम माना गया है। ये श्वेत चरणों से युक्त होकर सुवर्णमय अग्रभाग वाले रथ को वहन करते हुए प्राणियों को प्रकाशित करते हैं।
सायण दृष्टिकोण के अनुसार समस्त प्रजा और लोक उस प्रेरक दिव्य सूर्य के समीप, अर्थात् उसके प्रकाश के क्षेत्र में स्थित रहते हैं।
सरल भावार्थ:
श्याव नाम वाले सूर्य के घोड़े, श्वेत चरणों से युक्त होकर सुवर्णमय रथ को वहन करते हुए प्राणियों को प्रकाशित करते हैं। समस्त प्रजा और लोक उस प्रेरक दिव्य सूर्य के समीप स्थित रहते हैं।
🕉️ ३. स्वामी दयानन्द सरस्वती का भाष्यार्थ
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इस मन्त्र को अधिक व्यापक एवं आध्यात्मिक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा है।
उनके भाष्यार्थ के अनुसार श्यावाः वे हैं जो व्यापक रूप से प्राप्त होते हैं तथा शितिपादः श्वेत किरणों अथवा प्रकाश के अंशों से युक्त होने का बोध कराता है।
हिरण्यप्रउगम् को ज्योतिर्मय अग्नि अथवा प्रकाशयुक्त स्थान से संबंधित माना गया है। भुवनानि के अंतर्गत पृथिवीगोल आदि लोकों का ग्रहण किया गया है।
सरल भावार्थ:
विशेष ज्ञानवान् तथा व्यापक रूप से प्राप्त होने वाले प्रकाशरूप तत्व, श्वेत किरणों से युक्त होकर ज्योतिर्मय रथ को वहन करते हैं। सविता अर्थात् सूर्यलोक के समीप पृथिवीगोल आदि समस्त भुवन निरंतर स्थित हैं।
📚 ४. व्याकरण एवं पद-सिद्धि
शितिपादः
शितयः श्वेताः पादाः यस्य सः — यह बहुव्रीहि समास के रूप में व्याख्यायित किया गया है।
यहाँ श्वेत चरणों अथवा श्वेत किरणों से युक्त होने का अर्थ ग्रहण किया गया है।
अख्यन्
ख्या धातु से लुङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन की व्युत्पत्ति बताई गई है।
हिरण्यप्रउगम्
इसे हिरण्यस्य प्रउगम् — षष्ठी तत्पुरुष समास अथवा बहुव्रीहि समास के रूप में समझाया गया है।
दैव्यस्य
देव शब्द से तद्धित प्रत्यय द्वारा दैव्य रूप की सिद्धि बताई गई है।
उपस्थे
उप + स्था से बने उपस्थ शब्द का सप्तमी एकवचन रूप उपस्थे है।
इसका अर्थ है — समीप स्थान में, निकटता में अथवा गोद में।
🔬 ५. मन्त्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यह मन्त्र सूर्य, प्रकाश, ऊर्जा तथा समस्त भुवनों के साथ सूर्य के संबंध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैदिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
☀️ सौर ऊर्जा एवं गतिशीलता
श्यावाः और शितिपादः को प्रकाश एवं सूर्य की किरणों के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की किरणें अंतरिक्ष में निरंतर गतिशील रहती हैं और पृथ्वी तक ऊर्जा पहुँचाती हैं।
हिरण्यप्रउगम् रथम् को सूर्य के स्वर्ण-वर्ण प्रकाशपुंज तथा ऊर्जा-केंद्र के प्रतीक के रूप में समझने का प्रयास किया गया है।
🌍 सूर्य और भुवनों का संबंध
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भुवनानि का अर्थ पृथिवीगोलादि अर्थात् पृथ्वी तथा अन्य लोकों/गोलों के रूप में किया है।
इस दृष्टि से “सवितुः उपस्थे विश्वा भुवनानि तस्थुः” का भाव यह है कि समस्त भुवन सूर्य के समीपस्थ व्यापक क्षेत्र में व्यवस्थित हैं।
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य का गुरुत्वाकर्षण सौरमंडल की ग्रहों की कक्षीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कारण मन्त्र के इस भाग को सूर्य और ग्रहों के पारस्परिक संबंध पर एक वैदिक चिंतन के रूप में देखा जा सकता है।
💡 प्रकाश और जीवन
सूर्य पृथ्वी पर प्रकाश और ऊर्जा का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत है। पृथ्वी के जीव-जगत तथा अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाएँ सूर्य से प्राप्त ऊर्जा पर निर्भर हैं।
इस प्रकार मन्त्र में सूर्य, प्रकाश, ऊर्जा और समस्त भुवनों के संबंध का एक व्यापक चित्र प्रस्तुत होता है।
🌿 ६. मन्त्र का समग्र भाव
इस मन्त्र में सूर्य के प्रकाश, उसकी किरणों तथा उसके साथ समस्त भुवनों के संबंध का वर्णन मिलता है।
सायणाचार्य की व्याख्या में सूर्य के अश्वों और रथ की पारंपरिक वैदिक-पौराणिक व्याख्या दिखाई देती है, जबकि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शब्दों को व्यापक, आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक संदर्भ में समझाया है।
दोनों दृष्टिकोणों का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि वैदिक मन्त्रों को केवल एक ही स्तर पर न देखकर भाषा, व्याकरण, दर्शन, आध्यात्मिकता और प्राकृतिक जगत के संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है।
📌 निष्कर्ष
ऋग्वेद मन्त्र १.३५.५ सूर्य और उसके प्रकाश के प्रति वैदिक चिंतन को सामने रखता है। मन्त्र में प्रयुक्त श्यावाः, शितिपादः, हिरण्यप्रउगम्, सवितुः और भुवनानि जैसे पदों के माध्यम से प्रकाश, गति, ऊर्जा और भुवनों के संबंध पर विचार किया गया है।
यह मन्त्र हमें प्रकृति के प्रति जिज्ञासा, निरीक्षण और स्वाध्याय की प्रेरणा देता है।
ऋग्वेद का अध्ययन केवल मन्त्र-पाठ तक सीमित न रहकर उसके शब्दार्थ, व्याकरण, भाष्य और व्यापक अर्थ-चिंतन के साथ किया जाना चाहिए।
📚 स्रोत
ऋग्वेद — मन्त्र १.३५.५
सायण भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती भाष्य
ऋषि विश्वामित्र विद्या फाउंडेशन
प्रस्तुतकर्ता: आचार्य कपिल
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः।
वेदज्ञानं सर्वेभ्यः जनाय प्रसारयामः।

