chatgpt image aug 15, 2026, 07 16 34 am

ऋग्वेद मन्त्र १.३५.२ : सविता देवता (सूर्य) की महिमा

आध्यात्मिक, पारंपरिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

प्राचीन वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का एक विचारोत्तेजक समन्वय

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के पैंतीसवें सूक्त का द्वितीय मन्त्र सविता देवता के स्वरूप, गति, प्रकाश तथा समस्त भुवनों के साथ उनके संबंध का अत्यंत सुंदर वर्णन प्रस्तुत करता है। इस मन्त्र में सविता को ज्योतिर्मय रथ से गमन करने वाला तथा समस्त भुवनों को देखते हुए प्रकाश प्रदान करने वाला कहा गया है।

मन्त्र-पाठ — संहिता पाठ

आ कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑ च ।
हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒ना दे॒वो या॑ति॒ भुव॑नानि॒ पश्य॑न् ॥

पद-पाठ

आ । कृ॒ष्णेन॑ । रज॑सा । वर्त॑मानः । नि॒ऽवे॒शय॑न् । अ॒मृतम् । मर्त्यम् । च ।
हि॒र॒ण्ययेन । स॒विता । रथेन । आ । देवः । याति । भुवनानि । पश्यन् ॥

यह मन्त्र और इसका पद-पाठ मूल सामग्री में प्रस्तुत किया गया है।

पदवार शब्दार्थ

शब्दमूल अर्थ एवं व्याख्या
चारों ओर से, सर्वत्र
कृष्णेनकृष्णवर्ण/अंधकारयुक्त; दयानन्दीय व्याख्या में आकर्षण से संबंधित अर्थ
रजसालोकसमूह, पृथ्वी आदि लोक अथवा अंतरिक्ष
वर्तमानःगमन करते हुए, निरन्तर चलते हुए
निवेशयन्अपने-अपने स्थान या सामर्थ्य में स्थापित करते हुए
अमृतम्अमृत; दयानन्दीय व्याख्या में सत्यज्ञान अथवा वृष्टि से प्राप्त जीवनदायी रस
मर्त्यम्मरणधर्मी प्राणी या शरीर
और
हिरण्ययेनसुवर्णमय, ज्योतिर्मय अथवा तेजोमय
सविताउत्पन्न एवं प्रेरित करने वाला; सूर्य
रथेनरथ द्वारा, गतिमान वाहन द्वारा
देवःप्रकाशमान, प्रकाशित करने वाला
यातिगमन करता है
भुवनानिसमस्त भुवन/लोक
पश्यन्देखते हुए, प्रकाशित/अवेक्षण करते हुए

मूल PDF में इन शब्दों की व्याकरण एवं व्युत्पत्ति आधारित व्याख्या दी गई है।

१. पारंपरिक एवं आचार्यीय दृष्टिकोण

सायणाचार्य का भाष्य

सायणाचार्य की व्याख्या में सविता देवता को ऐसे प्रकाशमान सूर्य के रूप में देखा गया है जो अंधकारयुक्त अंतरिक्ष से गमन करते हुए आते हैं और अमर देवताओं तथा मरणशील मनुष्यों को उनके उचित स्थान एवं कार्यों में स्थापित करते हैं। वे सुवर्णमय रथ पर गमन करते हुए समस्त लोकों को देखते और प्रकाशित करते हैं।

इस दृष्टि से मन्त्र में सूर्योदय, प्रकाश का प्रसार और विश्व-व्यवस्था का सुंदर काव्यात्मक चित्र दिखाई देता है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती की व्याख्या

महर्षि दयानन्द सरस्वती की व्याख्या में सविता को समस्त जगत को उत्पन्न एवं प्रेरित करने वाला प्रकाशमान तत्व माना गया है। वे ‘कृष्णेन’ तथा ‘रजसा’ आदि पदों की व्याख्या लोकसमूह और आकर्षण के संदर्भ में करते हैं। साथ ही ‘अमृत’ को सत्यज्ञान अथवा वृष्टि से प्राप्त अमृतात्मक रस के रूप में समझाते हैं।

इस व्याख्या में मन्त्र केवल सूर्य के भौतिक प्रकाश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ज्ञान, जीवन, प्रेरणा और विश्व-व्यवस्था से भी जुड़ जाता है।

२. वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से इस मन्त्र को पढ़ते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वैदिक मन्त्र मूलतः वैदिक काव्य, दर्शन और धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में रचित हैं। इसलिए आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणाओं के साथ इनके संबंध को व्याख्यात्मक साम्य (interpretive parallel) के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण मानना।

फिर भी मन्त्र के अनेक बिम्ब आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणाओं के साथ रोचक संवाद स्थापित करते हैं।

गुरुत्वाकर्षण और ‘कृष्णेन रजसा’

मन्त्र में “कृष्णेन रजसा” पद आता है। महर्षि दयानन्द की व्याख्या में ‘कृष्णेन’ को आकर्षण करने वाली शक्ति के संदर्भ में समझाया गया है।

आधुनिक खगोल विज्ञान में सूर्य का गुरुत्वाकर्षण सौरमण्डल की संरचना और ग्रहों की कक्षीय गति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सूर्य का विशाल द्रव्यमान उसके चारों ओर स्थित ग्रहों और अन्य पिंडों की गति को प्रभावित करता है।

इस प्रकार दयानन्दीय ‘आकर्षण’ की व्याख्या और आधुनिक gravitational attraction के बीच एक विचारोत्तेजक साम्य देखा जा सकता है।

सूर्य की निरन्तर गति

मन्त्र में “वर्तमानो” और “याति” जैसे पद गति एवं गमन का बोध कराते हैं।

आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार सूर्य पूर्णतः स्थिर नहीं है। वह स्वयं आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा करता है और सौरमण्डल के ग्रह भी उसके साथ आकाशगंगीय अंतरिक्ष में गति करते हैं। मूल अध्ययन में सूर्य की आकाशगंगीय गति को लगभग 220 km/s के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अतः “वर्तमानो याति” को आधुनिक संदर्भ में सूर्य की गतिशीलता के साथ जोड़कर देखा जा सकता है।

“अमृतं मर्त्यं च” — ऊर्जा और जीवन

मन्त्र का एक महत्वपूर्ण पद है—

“निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च”

मूल अध्ययन में इसे जीवनदायी ऊर्जा और मरणधर्मी जीवों के संदर्भ में समझाया गया है। सूर्य का प्रकाश और ऊष्मा पृथ्वी पर जीवन की आधारभूत ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पौधे सूर्य के प्रकाश की सहायता से प्रकाश-संश्लेषण करते हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला और पृथ्वी का जैविक जीवन-चक्र संचालित होता है।

इस दृष्टि से “अमृत” को जीवनदायी रस/ऊर्जा के प्रतीकात्मक अर्थ में तथा “मर्त्य” को जीव-जगत के संदर्भ में समझना एक सार्थक आधुनिक व्याख्यात्मक दृष्टि हो सकती है।

“हिरण्ययेन रथेन” — ज्योतिर्मय रथ

मन्त्र में सविता के लिए कहा गया है—

“हिरण्ययेन रथेन”

अर्थात् हिरण्यमय/ज्योतिर्मय रथ द्वारा।

वैदिक काव्य में रथ सूर्य की गति का अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक है। आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में सूर्य से निकलने वाला विद्युत-चुंबकीय विकिरण अंतरिक्ष में फैलता है और पृथ्वी तक प्रकाश तथा ऊर्जा पहुँचाता है। मूल अध्ययन में ‘ज्योतिर्मय रथ’ को इसी प्रकाश एवं विद्युत-चुंबकीय विकिरण के साथ तुलनात्मक रूप से जोड़ा गया है।

इसलिए “हिरण्ययेन रथेन” को आधुनिक दृष्टि से सूर्य के प्रकाश और विकिरण के प्रतीकात्मक बिम्ब के रूप में देखा जा सकता है।

३. आध्यात्मिक दृष्टिकोण

सविता केवल भौतिक सूर्य का नाम नहीं है; वैदिक परम्परा में सविता प्रेरणा, गति और जीवन-व्यवस्था से भी संबंधित देवता हैं।

मन्त्र में सविता—

  • गति प्रदान करता है,
  • प्रकाश देता है,
  • भुवनों को प्रकाशित करता है,
  • जीवन-चक्र को प्रभावित करता है,
  • और समस्त जगत की व्यवस्था से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

इस प्रकार सूर्य यहाँ केवल आकाश में दिखाई देने वाला एक पिण्ड नहीं, बल्कि प्रकाश, चेतना, प्रेरणा और जीवन के व्यापक प्रतीक के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है।

४. मन्त्र का समन्वित भाव

इस मन्त्र को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—

आध्यात्मिक स्तर

सविता प्रकाश, प्रेरणा और जीवन-व्यवस्था का दिव्य प्रतीक है।

पारंपरिक स्तर

सायणाचार्य और महर्षि दयानन्द जैसे आचार्यों ने मन्त्र के पदों की अपनी-अपनी व्याख्या द्वारा सूर्य, लोक, जीवन, ज्ञान और विश्व-व्यवस्था के संबंध को स्पष्ट किया है।

वैज्ञानिक स्तर

आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में सूर्य की गति, गुरुत्वीय प्रभाव, प्रकाश, ऊर्जा और पृथ्वी के जीवन-चक्र के साथ मन्त्र के बिम्बों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

निष्कर्ष

ऋग्वेद १.३५.२ का यह मन्त्र सविता की गति, ज्योति और विश्व के साथ उनके संबंध का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है।

“हिरण्ययेन सविता रथेन…” में दिखाई देने वाला ज्योतिर्मय रथ वैदिक काव्य की अद्भुत कल्पना है, जबकि आधुनिक दृष्टि से सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा के प्रसार के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन एक रोचक विषय बन जाता है।

इसी प्रकार “वर्तमानो याति” को गति के व्यापक विचार से तथा “अमृतं मर्त्यं च” को जीवन-चक्र और ऊर्जा के संदर्भ से जोड़कर देखा जा सकता है।

हालाँकि इन समानताओं को आधुनिक विज्ञान के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय वैदिक मन्त्र और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के बीच संवाद एवं तुलनात्मक अध्ययन के रूप में प्रस्तुत करना अधिक अकादमिक रूप से उचित है।

इस प्रकार यह मन्त्र हमें एक साथ प्रकाश, गति, जीवन, प्रकृति और ब्रह्माण्ड पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।


ऋषि विश्वामित्र विद्या फाउन्डेशन

प्रस्तुतकर्ता: आचार्य कपिल
चलभाष: 8756390767

उद्देश्य: वेद, संस्कृत एवं वैदिक ज्ञान का अध्ययन, संरक्षण एवं आधुनिक संदर्भों में प्रसार।

प्राचीन वैदिक ज्ञान को समझें — अध्ययन, तर्क और आधुनिक दृष्टि के साथ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *