🔱 ऋग्वेद मंत्र
अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥
मैं पुरोहित अग्नि की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ के होता हैं, ऋत्विज् हैं, यज्ञ के रत्नस्वरूप फल देने वाले हैं।
🕉️ भावार्थ एवं व्याख्या
| पद | अर्थ |
|---|---|
| अग्निम् | अग्नि को |
| ईळे | मैं स्तुति करता हूँ |
| पुरोहितम् | आगे स्थापित/पुरोहित रूप से स्थित |
| यज्ञस्य | यज्ञ के |
| देवम् | देव को |
| ऋत्विजम् | ऋतु के अनुसार यज्ञ करने वाले को |
| होतारम् | आहुति देने/देवताओं का आह्वान करने वाले को |
| रत्नधातमम् | श्रेष्ठतम रत्न/सम्पदाओं को धारण कराने वाले को |
ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र का पद-शः व्याकरण और स्वर-प्रक्रिया
पाणिनि व्याकरण के सूत्रों का उपयोग करते हुए मन्त्र के प्रत्येक शब्द की सिद्धि और उनके वैदिक स्वरों (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचय) को स्पष्ट किया गया है:
ईळे (Iile – स्तुति करता हूँ):
नियम: यह एक तिङन्त (क्रिया) पद है। पाणिनीय सूत्र (पा.सू. ८.१.२८ ‘तिङ्ङतिङः’) के अनुसार, चूँकि यह अतिङन्त पद (‘अग्नि’) के ठीक बाद आया है, इसलिए यह सम्पूर्ण पद निघात यानी अनुदात्त (Accentless) हो जाता है।
संहिता (संधि) स्वर: जब दो शब्दों को मिलाकर पढ़ा जाता है, तो सूत्र (८.४.६६) से ‘ई’ कार स्वरित हो जाता है और उसके बाद आने वाला ‘ए’ कार सूत्र (१.२.३९) से ‘प्रचय’ (एकश्रुति) बन जाता है।
पुरोहितम् (Purohitam):
नियम: ‘पुरस्’ शब्द अन्तोदात्त (अंतिम स्वर उदात्त) है। ‘धा’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय होकर ‘हित’ शब्द बनता है, जो सूत्र (७.४.४२) से अन्तोदात्त है।
समास होने पर: सूत्र (६.२.२ ‘तत्पुरुषे तुल्यार्थ…’) या गति-संज्ञा सूत्र (६.२.४९) के कारण यहाँ पूर्वपद प्रकृति स्वर रहता है। परिणामतः इसका ‘ओ’ कार उदात्त (High pitch) हो जाता है।
यज्ञम् (Yajnam):
नियम: ‘यज्’ धातु में ‘नङ्’ प्रत्यय लगने से (३.३.९०) ‘यज्ञ’ शब्द बनता है। प्रत्यय के प्रभाव से यह अन्तोदात्त है। विभक्ति लगने के पश्चात् शेष भाग में अनुदात्त और स्वरित का नियम लागू होता है।
देवम् (Devam):
नियम: यह पचादिगण का शब्द है, जिसमें ‘अच्’ प्रत्यय (३.१.१३४) लगा है।
स्वर: यह फिट्-स्वर, प्रत्यय-स्वर (३.१.३) अथवा चित्-स्वर (६.१.१६३) के कारण अन्तोदात्त है।
ऋत्विजम् (Rtvijam – ऋतुओं में यजन करने वाला):
नियम: “ऋतौ यजति” इस विग्रह में ‘ऋत्विग्दधृक्…’ सूत्र (३.२.५९) से निपातन द्वारा इसकी सिद्धि होती है।
स्वर: ‘गतिकारकोपपदात्कृत्’ सूत्र (६.२.१३९) से कृदुत्तरपद प्रकृति स्वर के कारण यह अन्तोदात्त है।
होतारम् (Hotaram – देवों को बुलाने वाला / आहुति देने वाला):
नियम: ‘हु’ (दान / हवन) धातु में ‘तृन्’ प्रत्यय (३.२.१३५) लगा है।
स्वर: क्योंकि प्रत्यय ‘नित्’ (न् की इत्संज्ञा) है, इसलिए सूत्र (६.१.१९७) के अनुसार यह आद्युदात्त (पहला स्वर उदात्त) है।
रत्नधातमम् (Ratnadhatamam – रत्नों (कर्मफलों) को सर्वाधिक धारण कराने वाला):
नियम: ‘रत्न’ शब्द फिट् सूत्र (२६) से आद्युदात्त है। ‘रत्नानि दधाति’ विग्रह से समास होने पर ‘रत्नधा’ अन्तोदात्त बन जाता है।
स्वर: जब इसमें अतिशय अर्थ में ‘तमप्’ प्रत्यय (५.३.५५) लगता है, तो ‘पित्’ (प् की इत्संज्ञा) होने के कारण सूत्र (३.१.४) से प्रत्यय अनुदात्त हो जाता है और शेष में स्वरित-प्रचय प्रक्रिया लागू होती है।
निष्कर्ष (उपसंहार)
”वेदावतार अद्याया ऋचोऽर्थश्च प्रपञ्चितः । विज्ञातं वेदगाम्भीर्यमथ संक्षिप्य वर्ण्यते ।।”
भावार्थ: इस प्रकार वेदों के प्राकट्य (अवतार) स्वरूप, ऋग्वेद की प्रथम ऋचा (मन्त्र) के अर्थ और उसकी जटिल व्याकरणिक-प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन (प्रपञ्चित) किया गया है। इससे वेदों के शब्दों और उनके उच्चारण (स्वरों) का गाम्भीर्य (गहराई) ज्ञात होता है। इसी आधार पर आगे के मन्त्रों का संक्षेप में वर्णन किया जाएगा।

